कुरान - 23:62 सूरह अल-मुमिनून अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

62
وَلَا نُكَلِّفُ نَفۡسًا إِلَّا وُسۡعَهَاۚ وَلَدَيۡنَا كِتَٰبٞ يَنطِقُ بِٱلۡحَقِّ وَهُمۡ لَا يُظۡلَمُونَ

Transliteration: (Wa laa nukallifu nafsan illaa wus'ahaa wa ladainaa kitaabuny yantiqu bilhaqqi wa hum la yuzlamoon)

62. और हम किसी जान पर उसकी ताक़त (गुंजाइश) से ज़्यादा बोझ नहीं डालते; और हमारे पास एक किताब है जो बिल्कुल सच-सच बोलती है [94], और उन पर कोई ज़ुल्म नहीं किया जाएगा [95] । (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अल-मुमिनून आयत 62 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

सूरह अल-मोमिनून — आयत 62 की तफ़सीर

"और हम किसी जान पर उसकी ताक़त (गुंजाइश) से ज़्यादा बोझ नहीं डालते; और हमारे पास एक किताब है जो बिल्कुल सच-सच बोलती है [94], और उन पर कोई ज़ुल्म नहीं किया जाएगा [95] ।"

[94] सच बोलने वाली किताब: नाम-ए-आमाल व लौहे महफ़ूज़

किताब से मुराद इंसान का नामा-ए-आमाल है जिसमें हर अमल दर्ज है। यह किताब क़ियामत के दिन ठीक-ठीक गवाही देगी ताकि हुज्जत तमाम हो जाए।

[95] अदले इलाही: कोई बे-इंसाफ़ी नहीं

किसी पर उसके गुनाह से ज़्यादा अज़ाब नहीं होगा और किसी की नेकी का सवाब ज़रा बराबर भी ज़ाया नहीं किया जाएगा।

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