Transliteration: (Izaa tutlaa'alaihi aayaatunaa qaala asaateerul awwaleen )
"जब हमारी आयतें उनके सामने पढ़ी जाती हैं, तो वे कहते हैं: 'ये तो बस अगले लोगों की कहानियाँ हैं।'"
🔸 इस आयत में उन इंकार करने वालों के रवैये को बयान किया गया है जो क़ुरआन का मज़ाक उड़ाते और इसे पुराने क़िस्से-कहानियों से तश्बीह देते हैं।
🔹 इस इनकार की वजह से क़ुरआन उनके दिलों पर असर नहीं करता।
🔹 सच्चा ईमान लाने के लिए क़ुरआन पर परियों की कहानियों या आम किताबों की तरह नहीं, बल्कि पूरी ईमानदारी और यक़ीन के साथ विश्वास करना ज़रूरी है।
🔹 क़ुरआन की आयतें कानों से सुनी जाती हैं, लेकिन उसकी हक़ीक़त और रहमत को सिर्फ़ ईमान की रोशनी से ही समझा जा सकता है।
🔸 जो लोग क़ुरआन को महज़ कहानियाँ समझते हैं, वे इसकी हिकमत (दिव्य ज्ञान) को नहीं समझ पाते और हमेशा हिदायत से महरूम रहते हैं।
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