Transliteration: (Wa maa yukazzibu biheee illaa kullu mu'tadin aseem)
"और इसे कोई नहीं झुटलाता मगर हद से बढ़ने वाला, बड़ा गुनाहगार।"
🔸 इस आयत में क़यामत का इनकार करने वालों को हद से बढ़ने वाले (ज़ालिम) और गुनाहगार कहा गया है।
🔹 हद से बढ़ने वाला (ज़ालिम) – वह व्यक्ति जिसका अक़ीदा (विश्वास) बिगड़ा हुआ हो। वह अल्लाह के इंसाफ़, उसके हमेशा रहने वाले शासन और क़ुदरत का इंकार करता है।
🔹 गुनाहगार (फ़ासिक़) – वह व्यक्ति जो बुरे कामों में डूबा रहता है और आख़िरत का इनकार करके नाफरमानी करता है।
🔹 ज़ालिम दूसरों पर ज़ुल्म करता है, जबकि गुनाहगार अपनी इबादत में कोताही करता है।
🔸 यह आयत हमें सिखाती है कि धर्मिक अक़ीदे का इनकार अक्सर निजी ख्वाहिशों की वजह से होता है। बहुत से काफ़िर क़यामत के दिन का इंकार सिर्फ़ इसलिए करते हैं ताकि अपने गुनाहों को जायज़ ठहरा सकें।
🔸 इसके अलावा, कुछ ख़ुद को ‘आज़ाद ख़्याल’ कहने वाले लोग सिर्फ़ इसलिए इस्लामी उलमा का विरोध करते हैं क्योंकि उलमा उनकी ग़लतख्याली और नाजायज़ ख्वाहिशों के रास्ते में रुकावट बनते हैं।
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