कुरान - 54:14 सूरह अल-क़मर अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

14
تَجۡرِي بِأَعۡيُنِنَا جَزَآءٗ لِّمَن كَانَ كُفِرَ

Transliteration: (Tajree bi a'yuninaa jazaaa'an liman kaana kufir)

जो हमारी निगाहों के सामने (हिफ़ाज़त से) तैरती थी [22], उस शख़्स के इनाम के तौर पर जिसे झुठलाया गया था [23]! (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अल-क़मर आयत 14 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

सूरह अल-क़मर तफ़सीर - आयत 14

"जो हमारी निगाहों के सामने (हिफ़ाज़त से) तैरती थी [22], उस शख़्स के इनाम के तौर पर जिसे झुठलाया गया था [23]!"


[22] हिफ़ाज़त-ए-इलाही और वसीला की बरकत

हज़रत मुफ़्ती अहमद यार ख़ान नईमी रहमतुल्लाह अलैह फ़रमाते हैं कि उस भयानक तूफ़ान में सिर्फ़ लकड़ी की कश्ती बचा नहीं सकती थी; असल हिफ़ाज़त अल्लाह तआला की नज़र-ए-इनायत थी।

[23] नबी का वसीला

कश्ती में सवार होने वाले तमाम मोमिनीन हज़रत नूह (अलैहिस्सलाम) के तुफ़ैल और वसीले से बचे। इससे साबित हुआ कि अल्लाह के महबूबों का दामन थामने से दुनिया व आख़िरत के तूफ़ानों से नजात मिलती है।

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