कुरान - 54:24 सूरह अल-क़मर अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

24
فَقَالُوٓاْ أَبَشَرٗا مِّنَّا وَٰحِدٗا نَّتَّبِعُهُۥٓ إِنَّآ إِذٗا لَّفِي ضَلَٰلٖ وَسُعُرٍ

Transliteration: (Faqaalooo a' basharan minnaa waahidan nattabi'uhooo innaa izal lafee dalaalinw wa su'ur)

और वे बोले: "क्या हम अपने ही में से एक आदमी की पैरवी करें [32]? तब तो बेशक हम ज़रूर गुमराही और दीवानेपन में पड़े होंगे [33]!" (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अल-क़मर आयत 24 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

सूरह अल-क़मर तफ़सीर - आयत 24

"और वे बोले: 'क्या हम अपने ही में से एक आदमी की पैरवी करें [32]? तब तो बेशक हम ज़रूर गुमराही और दीवानेपन में पड़े होंगे [33]!'"


[32] बशरी नबी की पैरवी से इंकार

हज़रत मुफ़्ती अहमद यार ख़ान नईमी रहमतुल्लाह अलैह फ़रमाते हैं:

  • मुनकिरीन का फ़लसफ़ा: क़ुरआन मजीद में रसूलों को महज़ 'इंसान/बशर' कहकर इंकार करना हमेशा काफ़िरों और मुशरिकों का तरीक़ा रहा है। वे नबी की रूहानी अज़्मत और नुबूवत के मुक़द्दस मक़ाम को देखने के बजाय सिर्फ़ ज़ाहिरी बशरियत देखकर गुमराह हुए।

[33] हज़रत सालेह अलैहिस्सलाम की शान में गुस्ताख़ी

काफ़िरों ने गुस्ताख़ी करते हुए कहा कि अगर हम अपने ही जैसे एक शख़्स की इताअत कर लें, तो हम अक़्ल से ख़ाली और पागल समझे जाएँगे। वे अपने तकब्बुर में अंधे होकर हक़ से दूर हो गए।

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