कुरान - 54:25 सूरह अल-क़मर अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

25
أَءُلۡقِيَ ٱلذِّكۡرُ عَلَيۡهِ مِنۢ بَيۡنِنَا بَلۡ هُوَ كَذَّابٌ أَشِرٞ

Transliteration: ('A ulqiyaz zikru 'alaihi min baininaa bal huwa kazzaabun ashir)

क्या हम सबमें से उसी पर नसीहत उतारी गई [34]? बल्कि वह बड़ा झूठा, बड़ाई मारने वाला है [35]! (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अल-क़मर आयत 25 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

सूरह अल-क़मर तफ़सीर - आयत 25

"क्या हम सबमें से उसी पर नसीहत उतारी गई [34]? बल्कि वह बड़ा झूठा, बड़ाई मारने वाला है [35]!"


[34] माल व ताकत के तकब्बुर में नबूवत का इंकार

हज़रत मुफ़्ती अहमद यार ख़ान नईमी रहमतुल्लाह अलैह फ़रमाते हैं कि क़ौम-ए-समूद के सरदारों को यह ग़ुरूर था कि वे माल, दौलत और ताक़त में बड़े हैं, लिहाज़ा वही वही (नसीहत) पाने के हक़दार थे न कि सालेह (अलैहिस्सलाम)। वे दुनियावी अस्बाब को फ़ज़ीलत का मेयार समझते थे।

[35] मुनकिरीन का बोहतान और झूठा इलज़ाम

काफ़िरों ने हज़रत सालेह अलैहिस्सलाम पर झूठा और बड़ाई मारने का बोहतान लगाया। मुनकिरीन की यह क़दीम ख़स्लत रही है कि जब उनके पास दलील नहीं रहती तो वे अल्लाह के पैग़म्बरों पर इल्ज़ामात तराशते हैं।

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