Transliteration: ('A ulqiyaz zikru 'alaihi min baininaa bal huwa kazzaabun ashir)
"क्या हम सबमें से उसी पर नसीहत उतारी गई [34]? बल्कि वह बड़ा झूठा, बड़ाई मारने वाला है [35]!"
हज़रत मुफ़्ती अहमद यार ख़ान नईमी रहमतुल्लाह अलैह फ़रमाते हैं कि क़ौम-ए-समूद के सरदारों को यह ग़ुरूर था कि वे माल, दौलत और ताक़त में बड़े हैं, लिहाज़ा वही वही (नसीहत) पाने के हक़दार थे न कि सालेह (अलैहिस्सलाम)। वे दुनियावी अस्बाब को फ़ज़ीलत का मेयार समझते थे।
काफ़िरों ने हज़रत सालेह अलैहिस्सलाम पर झूठा और बड़ाई मारने का बोहतान लगाया। मुनकिरीन की यह क़दीम ख़स्लत रही है कि जब उनके पास दलील नहीं रहती तो वे अल्लाह के पैग़म्बरों पर इल्ज़ामात तराशते हैं।
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