Transliteration: (Fakaifa kaana 'azaabee wa nuzur)
"तो कैसा रहा मेरा अज़ाब और मेरा डराना [41]!"
हज़रत मुफ़्ती अहमद यार ख़ान नईमी रहमतुल्लाह अलैह फ़रमाते हैं कि ज़ाहिर में क़त्ल करने वाला सिर्फ़ एक बदबख़्त (क़ैदार) था, मगर पूरी क़ौम उस गुनाह पर राज़ी थी और उसकी मदद कर रही थी। शरीअत का उसूल है कि गुनाह पर रज़ा भी गुनाह है, इसलिए अल्लाह का अज़ाब पूरी क़ौम पर एक साथ नाज़िल हुआ।
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