Transliteration: (Fazooqoo 'azaabee wa nuzur)
"अब चखो मेरा अज़ाब और मेरा डराना [53]!"
हज़रत मुफ़्ती अहमद यार ख़ान नईमी रहमतुल्लाह अलैह फ़रमाते हैं कि यह इरशाद-ए-इलाही फ़रिश्तों की ज़बानी काफ़िरों को सुनाया गया जब वे अज़ाब की लपेट में आ रहे थे। यह सिर्फ़ अज़ाब का नाफ़िज़ होना नहीं था बल्कि उन पर यह ज़ाहिर करना था कि जो अज़ाब आज वे भुगत रहे हैं, यह अल्लाह के पैग़म्बरों की खुली चेतावनियों को झुठलाने का अज़ाब है।
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