Transliteration: (Wa laqad raawadoohu 'andaifeehee fatamasnaaa a'yunahum fazooqoo 'azaabee wa nuzur)
"और बेशक उन्होंने उनके मेहमानों (फ़रिश्तों) को फुसलाना चाहा [49], तो हमने उनकी आँखें अंधी कर दीं (मिटा दीं) [50], अब चखो मेरा अज़ाब और मेरा डराना [51]!"
हज़रत मुफ़्ती अहमद यार ख़ान नईमी रहमतुल्लाह अलैह फ़रमाते हैं कि जब हज़रत जिब्राईल और फ़रिश्ते ख़ूबसूरत इंसानी शक्ल में हज़रत लूत के यहाँ मेहमान बनकर आए, तो क़ौम के बदमाश बदनीयती से उनके घर पर चढ़ आए और मेहमानों को सौंपने का मुतालबा करने लगे।
हज़रत जिब्राईल अलैहिस्सलाम ने अपने पर (बाज़ू) की एक हल्की सी ज़रब उनके चेहरों पर मारी, जिससे उनकी आँखें बिल्कुल सपाट और अंधी हो गईं। वे बदहवास होकर दीवारों से टकराने लगे।
यह उनकी ज़िल्लत की इब्तिदा थी। उन्हें बता दिया गया कि जिस अज़ाब का तुम मज़ाक़ उड़ाते थे, अब उसका मज़ा चखो!
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