कुरान - 28:18 सूरह अल-क़सस अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

18
فَأَصۡبَحَ فِي ٱلۡمَدِينَةِ خَآئِفٗا يَتَرَقَّبُ فَإِذَا ٱلَّذِي ٱسۡتَنصَرَهُۥ بِٱلۡأَمۡسِ يَسۡتَصۡرِخُهُۥۚ قَالَ لَهُۥ مُوسَىٰٓ إِنَّكَ لَغَوِيّٞ مُّبِينٞ

Transliteration: (Fa asbaha fil madeenati khaaa'ifany yataraqqabu fa izal lazis tansarahoo bil amsi yastasrikhuh; qaala lahoo moosaaa innaka laghawiyyum mubeen)

फिर सुबह के वक़्त वे शहर में डरते हुए और (आने वाले हालात का) इंतज़ार करते हुए निकले [46], तो अचानक क्या देखते हैं कि वही शख़्स जिसने कल उनसे मदद मांगी थी, आज फिर उन्हें फ़रियाद कर रहा है [47]! मूसा ने उससे कहा, 'बेशक तू खुला गुमराह आदमी है [48]!' (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अल-क़सस आयत 18 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

सूरह अल-क़सस तफ़सीर - आयत 18

"फिर सुबह के वक़्त वे शहर में डरते हुए और (आने वाले हालात का) इंतज़ार करते हुए निकले [46], तो अचानक क्या देखते हैं कि वही शख़्स जिसने कल उनसे मदद मांगी थी, आज फिर उन्हें फ़रियाद कर रहा है [47]! मूसा ने उससे कहा, 'बेशक तू खुला गुमराह आदमी है [48]!'"

[46] ख़ौफ़ और चौकसी का आलम

हज़रत मूसा शहर में इस अंदेशे के साथ निकले कि देखें क़िब्ती के क़त्ल का क्या असर हुआ और फ़िरऔन के सिपाही क्या कर रहे हैं।

[47] उसी इसराईली का दोबारा झगड़ा

अगले ही दिन वही इसराईली एक और क़िब्ती से उलझ रहा था और मूसा को देखकर फिर चीख़ने लगा कि मेरी मदद करो।

[48] फ़सादी शख़्स को डांट

हज़रत मूसा ने उस इसराईली को डांटा कि तू बड़ा झगड़ालू और बेवक़ूफ़ है, हर रोज़ नया फ़साद खड़ा करके दूसरों को मुसीबत में डालता है!

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