कुरान - 28:3 सूरह अल-क़सस अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

3
نَتۡلُواْ عَلَيۡكَ مِن نَّبَإِ مُوسَىٰ وَفِرۡعَوۡنَ بِٱلۡحَقِّ لِقَوۡمٖ يُؤۡمِنُونَ

Transliteration: (Natloo 'alaika min naba-i Moosaa wa Fir'awna bilhaqqi liqawminy yu'miinoon)

हम आपको मूसा और फ़िरऔन का सच्चा क़िस्सा [3] ईमान लाने वालों के लिए [4] ठीक-ठीक पढ़कर सुनाते हैं। (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अल-क़सस आयत 3 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

सूरह अल-क़सस तफ़सीर - आयत 3

"हम आपको मूसा और फ़िरऔन का सच्चा क़िस्सा [3] ईमान लाने वालों के लिए [4] ठीक-ठीक पढ़कर सुनाते हैं।"

[3] मूसा और फ़िरऔन का सच्चा वाक़िआ

अल्लाह तआला अपने हबीब ﷺ को हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम और फ़िरऔन का बिल्कुल सच्चा, बे-ऐब और हक़ीक़त पर मबनी वाक़िआ बयान फ़रमाता है। यह क़िस्सा कोई मनगढ़ंत कहानी या अफ़साना नहीं, बल्कि तारीफ़ व तहरीफ़ से पाक इलाही वही है।

[4] अहले ईमान के लिए इबरत व रहनुमाई

अगरचे क़ुरआन की दावत सबके लिए है, मगर इस तारीखी वाक़िए से हक़ीक़ी नसीहत और सबक़ वही हासिल करते हैं जो अल्लाह और उसके रसूल पर ईमान रखते हैं। ईमान वालों को इससे यक़ीन हासिल होता है कि ज़ुल्म कितना ही ताक़तवर क्यों न हो, आख़िरकार फ़तह हक़ और सब्र करने वालों की ही होती है।

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