Transliteration: (Wa izaa baddalnaaa Aayatam makaana Aayatinw wal laahu a'lamu bimaa yunazzilu qaalooo innamaa anta muftar; bal aksaruhum laa ya'lamoon)
"और जब हम एक आयत की जगह दूसरी आयत बदल देते हैं, और अल्लाह ख़ूब जानता है जो कुछ वह उतारता है [229], तो काफ़िर कहते हैं, 'तुम तो अपने जी से बना लाते हो [230]।' बल्कि उनमें से अक्सर बे-इल्म हैं [231]।"
अल्लाह तआला अपने बन्दों की मस्लेहतों को ख़ूब जानता है कि किस वक़्त कौन सा हुक्म उनके लिए मुफ़ीद है; जैसे हकीम मरीज़ की हालत देखकर दवा बदलता है, वैसे ही अल्लाह तआला वक़्त की ज़रूरत के मुताबिक़ हुक्म मन्सूस या मंसूख़ फ़रमाता है।
जब कोई सख़्त हुक्म आसान हुक्म से बदला जाता, तो मुशरिक़ीन तोहमत लगाते कि मुहम्मद ﷺ अपनी मर्ज़ी से बातें बदलते हैं (मआज़अल्लाह)।
वे नासिख़ व मंसूख़ (हुक्म के बदलने) की हिकमत और अल्लाह की तदबीर से बिल्कुल बे-इल्म और बे-ख़बर हैं।
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