कुरान - 16:101 सूरह अल-नहल अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

101
وَإِذَا بَدَّلۡنَآ ءَايَةٗ مَّكَانَ ءَايَةٖ وَٱللَّهُ أَعۡلَمُ بِمَا يُنَزِّلُ قَالُوٓاْ إِنَّمَآ أَنتَ مُفۡتَرِۭۚ بَلۡ أَكۡثَرُهُمۡ لَا يَعۡلَمُونَ

Transliteration: (Wa izaa baddalnaaa Aayatam makaana Aayatinw wal laahu a'lamu bimaa yunazzilu qaalooo innamaa anta muftar; bal aksaruhum laa ya'lamoon)

और जब हम एक आयत की जगह दूसरी आयत बदल देते हैं, और अल्लाह ख़ूब जानता है जो कुछ वह उतारता है [229], तो काफ़िर कहते हैं, "तुम तो अपने जी से बना लाते हो [230]।" बल्कि उनमें से अक्सर बे-इल्म हैं [231]। (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अल-नहल आयत 101 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

सूरह अन-नह्ल – आयत 101 की तफ़सीर (तफ़सीरे नईमी)

"और जब हम एक आयत की जगह दूसरी आयत बदल देते हैं, और अल्लाह ख़ूब जानता है जो कुछ वह उतारता है [229], तो काफ़िर कहते हैं, 'तुम तो अपने जी से बना लाते हो [230]।' बल्कि उनमें से अक्सर बे-इल्म हैं [231]।"

[229] मस्लेहत-ए-इलाही और अहकाम का बदलना

अल्लाह तआला अपने बन्दों की मस्लेहतों को ख़ूब जानता है कि किस वक़्त कौन सा हुक्म उनके लिए मुफ़ीद है; जैसे हकीम मरीज़ की हालत देखकर दवा बदलता है, वैसे ही अल्लाह तआला वक़्त की ज़रूरत के मुताबिक़ हुक्म मन्सूस या मंसूख़ फ़रमाता है।

[230] काफ़िरों का बोहतान

जब कोई सख़्त हुक्म आसान हुक्म से बदला जाता, तो मुशरिक़ीन तोहमत लगाते कि मुहम्मद ﷺ अपनी मर्ज़ी से बातें बदलते हैं (मआज़अल्लाह)।

[231] मुनकिरीन की जहालत

वे नासिख़ व मंसूख़ (हुक्म के बदलने) की हिकमत और अल्लाह की तदबीर से बिल्कुल बे-इल्म और बे-ख़बर हैं।

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