Transliteration: (Wa laqad na'lamu annahum yaqooloona innamaa yu'allimuhoo bashar; lisaanul lazee yulhidoona ilaihi a'ja miyyunw wa haaza lisaanun 'Arabiyyum mubeen)
"और बेशक हमें मालूम है कि वे कहते हैं, 'उन्हें तो एक आदमी सिखाता है [235]।' जिस की तरफ़ वे इशारा करते हैं उसकी ज़बान अजमी है, और यह साफ़ अरबी ज़बान है [236]।"
शाने-नुज़ूल: मक्का में दो अजमी (ग़ैर-अरबी) रूमानी ग़ुलाम (यसार और जबीर) रहते थे जो लोहार का काम करते थे। हुज़ूर ﷺ कभी उनके पास से गुज़रते या गुफ़्तगू सुन लेते। मुशरिक़ीन ने झूठा शोशा छोड़ा कि हुज़ूर उनसे सीखते हैं। कभी वे क़ुरआन को जादू कहते, कभी शायरी और कभी इन्सान की सिखाई बात — यह उनके अन्दरूनी तज़ाद की दलील थी।
एक अजमी ग़ुलाम जो ठीक से अरबी बोल भी नहीं सकता, वह ऐसा बेमिसाल और फ़सीह क़ुरआन कैसे सिखा सकता है जिसके अदना मिसले लाने से अरब के बड़े-बड़े शोअरा और फ़ुसहा आजिज़ आ गए! क़ुरआन अलफ़ाज़ और मआनी दोनों के मजमूए का नाम है।
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