Transliteration: (man kafara billaahi mim ba'di eemaanihee illaa man ukriha wa qalbuhoo mutmma'innum bil eemaani wa laakim man sharaha bilkufri sadran fa'alaihim ghadabum minal laahi wa lahum 'azaabun 'azeem)
"जो कोई ईमान लाने के बाद अल्लाह के साथ कुफ़्र करे [239] — सिवाय उस शख़्स के जिसे मजबूर कर दिया जाए और उसका दिल ईमान पर जमा हुआ हो [240]... [241]।"
अल्लाह और उसके रसूल के अहकाम का इनकार करना कुफ़्र है।
शाने-नुज़ूल: मुशरिक़ीन ने हज़रत अम्मर बिन यासिर के वालिद हज़रत यासिर और वालिदा हज़रत सुमैय्या को शदीद अज़ीयतें देकर शहीद कर दिया (वे इस्लाम के पहले शहीद हैं)। हज़रत अम्मर ने जिस्मानी बेबसी में ज़बान से मुशरिकों की मुवाफ़िक़ बात कह दी जबकि दिल में ईमान पूरी तरह महफ़ूज़ था। वे रोते हुए हुज़ूर ﷺ की बारगाह में हाज़िर हुए, तो हुज़ूर ﷺ ने अपने मुबारक हाथों से उनके आँसू पोंछे और यह आयत नाज़िल हुई। जान बचाने के लिए सख़्त मजबूरी में ज़बान से कलिमा-ए-कुफ़्र कहना रुख़्सत है, बशर्ते कि दिल में ईमान साबित हो; अलबत्ता जान दे देना अज़ीमत और शहादत है।
जो अपनी मर्ज़ी और दिली रज़ा से कुफ़्र इख़्तियार करे, उस पर अल्लाह का ग़ज़ब और जहन्नम का अज़ाब है।
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