कुरान - 16:106 सूरह अल-नहल अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

106
مَن كَفَرَ بِٱللَّهِ مِنۢ بَعۡدِ إِيمَٰنِهِۦٓ إِلَّا مَنۡ أُكۡرِهَ وَقَلۡبُهُۥ مُطۡمَئِنُّۢ بِٱلۡإِيمَٰنِ وَلَٰكِن مَّن شَرَحَ بِٱلۡكُفۡرِ صَدۡرٗا فَعَلَيۡهِمۡ غَضَبٞ مِّنَ ٱللَّهِ وَلَهُمۡ عَذَابٌ عَظِيمٞ

Transliteration: (man kafara billaahi mim ba'di eemaanihee illaa man ukriha wa qalbuhoo mutmma'innum bil eemaani wa laakim man sharaha bilkufri sadran fa'alaihim ghadabum minal laahi wa lahum 'azaabun 'azeem)

जो कोई ईमान लाने के बाद अल्लाह के साथ कुफ़्र करे [239] — सिवाय उस शख़्स के जिसे मजबूर (विवश) कर दिया जाए और उसका दिल ईमान पर जमा हुआ हो [240] — लेकिन जो सीना खोलकर कुफ़्र इख़्तियार करे, तो उन पर अल्लाह का ग़ज़ब है और उनके लिए बहुत बड़ा अज़ाब है [241]। (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अल-नहल आयत 106 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

सूरह अन-नह्ल – आयत 106 की तफ़सीर (तफ़सीरे नईमी)

"जो कोई ईमान लाने के बाद अल्लाह के साथ कुफ़्र करे [239] — सिवाय उस शख़्स के जिसे मजबूर कर दिया जाए और उसका दिल ईमान पर जमा हुआ हो [240]... [241]।"

[239] इरतिदाद (धर्म त्याग) का अज़ीम जुर्म

अल्लाह और उसके रसूल के अहकाम का इनकार करना कुफ़्र है।

[240] हज़रत अम्मर बिन यासिर (रज़ि.) और इकराह् का हुक्म

शाने-नुज़ूल: मुशरिक़ीन ने हज़रत अम्मर बिन यासिर के वालिद हज़रत यासिर और वालिदा हज़रत सुमैय्या को शदीद अज़ीयतें देकर शहीद कर दिया (वे इस्लाम के पहले शहीद हैं)। हज़रत अम्मर ने जिस्मानी बेबसी में ज़बान से मुशरिकों की मुवाफ़िक़ बात कह दी जबकि दिल में ईमान पूरी तरह महफ़ूज़ था। वे रोते हुए हुज़ूर ﷺ की बारगाह में हाज़िर हुए, तो हुज़ूर ﷺ ने अपने मुबारक हाथों से उनके आँसू पोंछे और यह आयत नाज़िल हुई। जान बचाने के लिए सख़्त मजबूरी में ज़बान से कलिमा-ए-कुफ़्र कहना रुख़्सत है, बशर्ते कि दिल में ईमान साबित हो; अलबत्ता जान दे देना अज़ीमत और शहादत है।

[241] रज़ा-ए-दिल से कुफ़्र इख़्तियार करने की सज़ा

जो अपनी मर्ज़ी और दिली रज़ा से कुफ़्र इख़्तियार करे, उस पर अल्लाह का ग़ज़ब और जहन्नम का अज़ाब है।

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