कुरान - 16:116 सूरह अल-नहल अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

116
وَلَا تَقُولُواْ لِمَا تَصِفُ أَلۡسِنَتُكُمُ ٱلۡكَذِبَ هَٰذَا حَلَٰلٞ وَهَٰذَا حَرَامٞ لِّتَفۡتَرُواْ عَلَى ٱللَّهِ ٱلۡكَذِبَۚ إِنَّ ٱلَّذِينَ يَفۡتَرُونَ عَلَى ٱللَّهِ ٱلۡكَذِبَ لَا يُفۡلِحُونَ

Transliteration: (Wa laa taqooloo limaa tasifu alsinatukumul kaziba haaza halaalunw wa haazaa haraamul litaftaroo 'alal laahil kazib; innal lazeena yaftaroona 'alal laahil kaziba laa yuflihoon)

और अपनी ज़बानों के झूठे बयान के सबब यह न कह दिया करो: "यह हलाल है [260] और यह हराम है," ताकि अल्लाह पर झूठ बाँधो। बेशक जो अल्लाह पर झूठ बाँधते हैं वे कभी फ़लाह (कामयाबी) नहीं पाते [261]। (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अल-नहल आयत 116 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

सूरह अन-नह्ल – आयत 116 की तफ़सीर (तफ़सीरे नईमी)

"और अपनी ज़बानों के झूठे बयान के सबब यह न कह दिया करो: 'यह हलाल है [260] और यह हराम है,' ताकि अल्लाह पर झूठ बाँधो... [261]।"

[260] अपनी मर्ज़ी से हलाल व हराम ठहराना मना है

हलाल और हराम करना सिर्फ़ अल्लाह और उसके रसूल ﷺ का इख़्तियार है। अपनी ज़बान से बिना शरई दलील के किसी हलाल चीज़ को हराम या हराम को हलाल कहना अल्लाह पर बोहतान बाँधना है।

[261] दीन में मनमानी तहरीफ़ का वबाल

जो लोग बिना दलील के मुस्तहसन दीनी उमूर (जैसे मिलाद शरीफ़, फ़ातिहा व नियाज़) को हराम कहते हैं, वे इसी बोहतान के मुर्तकिब होते हैं। शरीअत में अस्ल इबाहत (हलाल होना) है जब तक कि मनाही की दलील न हो।

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