कुरान - 16:33 सूरह अल-नहल अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

33
هَلۡ يَنظُرُونَ إِلَّآ أَن تَأۡتِيَهُمُ ٱلۡمَلَـٰٓئِكَةُ أَوۡ يَأۡتِيَ أَمۡرُ رَبِّكَۚ كَذَٰلِكَ فَعَلَ ٱلَّذِينَ مِن قَبۡلِهِمۡۚ وَمَا ظَلَمَهُمُ ٱللَّهُ وَلَٰكِن كَانُوٓاْ أَنفُسَهُمۡ يَظۡلِمُونَ

Transliteration: (Hal yanzuroona illaaa an taatiyahumul malaaa'ikatu aw yaatiya amru Rabbik; kazaalika fa'alal lazeena min qablihim; wa maa zalamahumul laahu wa laakin kaanoo anfusahum yazlimoon)

काफ़िर काहे की राह देख रहे हैं [69] मगर इसकी कि फ़रिश्ते उन पर आ पड़ें या आपके रब का हुक्म आ जाए? ऐसा ही किया था उनसे अगलों ने [70]। और अल्लाह ने उन पर ज़ुल्म न किया बल्कि वे ख़ुद ही अपनी जानों पर ज़ुल्म करते थे [71]। (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अल-नहल आयत 33 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

सूरह अन-नह्ल – आयत 33 की तफ़सीर (तफ़सीरे नईमी)

"काफ़िर काहे की राह देख रहे हैं [69] मगर इसकी कि फ़रिश्ते उन पर आ पड़ें या आपके रब का हुक्म आ जाए? ऐसा ही किया था उनसे अगलों ने [70]। और अल्लाह ने उन पर ज़ुल्म न किया बल्कि वे ख़ुद ही अपनी जानों पर ज़ुल्म करते थे [71]।"

[69] ग़फ़लत में अज़ाब का इंतिज़ार

काफ़िर नबी करीम ﷺ के अख़लाक़ और मोजिज़ात देखकर भी ईमान नहीं लाते; क्या वे मौत या बद्र जैसे क़हरी अज़ाब के आने का इंतिज़ार कर रहे हैं?

[70] पिछली क़ौमों की तरह हठधर्मी

क़ौम-ए-आद और समूद ने भी यही रवैया अपनाया था और अज़ाब आने के बाद उनका ईमान क़ुबूल न हुआ, क्योंकि अज़ाब देखकर ईमान लाना मोअतबर नहीं।

[71] अपनी जानों पर ज़ुल्म

'ज़ुल्म' का मतलब है किसी चीज़ को उसके हक़ के ख़िलाफ़ इस्तेमाल करना। इन्सान अल्लाह की मिल्कियत है; अल्लाह के अहकाम के ख़िलाफ़ ज़िंदगी गुज़ारना हक़ीक़त में अपनी जान पर ज़ुल्म ढाना है।

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