Transliteration: (Hal yanzuroona illaaa an taatiyahumul malaaa'ikatu aw yaatiya amru Rabbik; kazaalika fa'alal lazeena min qablihim; wa maa zalamahumul laahu wa laakin kaanoo anfusahum yazlimoon)
"काफ़िर काहे की राह देख रहे हैं [69] मगर इसकी कि फ़रिश्ते उन पर आ पड़ें या आपके रब का हुक्म आ जाए? ऐसा ही किया था उनसे अगलों ने [70]। और अल्लाह ने उन पर ज़ुल्म न किया बल्कि वे ख़ुद ही अपनी जानों पर ज़ुल्म करते थे [71]।"
काफ़िर नबी करीम ﷺ के अख़लाक़ और मोजिज़ात देखकर भी ईमान नहीं लाते; क्या वे मौत या बद्र जैसे क़हरी अज़ाब के आने का इंतिज़ार कर रहे हैं?
क़ौम-ए-आद और समूद ने भी यही रवैया अपनाया था और अज़ाब आने के बाद उनका ईमान क़ुबूल न हुआ, क्योंकि अज़ाब देखकर ईमान लाना मोअतबर नहीं।
'ज़ुल्म' का मतलब है किसी चीज़ को उसके हक़ के ख़िलाफ़ इस्तेमाल करना। इन्सान अल्लाह की मिल्कियत है; अल्लाह के अहकाम के ख़िलाफ़ ज़िंदगी गुज़ारना हक़ीक़त में अपनी जान पर ज़ुल्म ढाना है।
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