Transliteration: (Wa qaalal lazeena ashrakoo law shaaa'al laahu ma 'abadnaa min doonihee min shai'in nahnu wa laaa aabaaa'unaa wa laa harramnaa min doonihee min shai'; kazaalika fa'alal lazeena min qablihim fahal 'alar Rusuli illal balaaghul mubeen)
"और मुशरिक बोले [73], 'अगर अल्लाह चाहता तो हम उसके सिवा किसी चीज़ को न पूजते...' ऐसा ही किया था उनसे अगलों ने [74]। तो क्या रसूलों पर साफ़-साफ़ पहुँचा देने के सिवा कुछ और भी ज़िम्मा है [75]?"
मुशरिक़ीन अपने शिर्क और गुनाहों को सही ठहराने के लिए कुतर्क करते थे कि अगर अल्लाह नाराज़ होता तो हमें रोकता; हमारा यह काम उसकी मशिय्यत के तहत है।
अल्लाह की 'मशिय्यत' (होने का इरादा) और उसकी 'रिज़ा' (पसन्द) में फ़र्क़ है। दुनिया में कुफ़्र व गुनाह अल्लाह की तख़्लीक़ी मशिय्यत से वाक़े होते हैं, मगर अल्लाह कुफ़्र से कभी राज़ी नहीं होता। मुशरिक़ीन ने दोनों को मिलाकर ढोंग रचा।
रसूलों का काम हक़ को साफ़-साफ़ पहुँचा देना है। इसके अलावा इसमें उन लोगों का भी रद्द है जो अपनी तरफ़ से बिना शरई दलील के चीज़ों को हराम क़रार देते हैं — जैसे मुशरिकों ने बहीरा व साइबा जानवरों को हराम किया था, या जो बाद में मिलाद शरीफ़ व ईसाल-ए-सवाब को नाजाइज़ कहते हैं।
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