Transliteration: (Wa laqad ba'asnaa fee kulli ummatir Rasoolan ani'budul laaha wajtanibut Taaghoota faminhum man hadal laahu wa minhum man haqqat 'alaihid dalaalah; faseeroo fil ardi fanzuroo kaifa kaana 'aaqibatul mukazzibeen)
"और बेशक हमने हर उम्मत में एक रसूल भेजा कि 'अल्लाह की बन्दगी करो [77] और शैतान से बचो।' तो उनमें से किसी को अल्लाह ने हिदायत दी और किसी पर गुमराही साबित हुई [78]। तो ज़मीन में सैर करो और देखो [79] कि झुठलाने वालों का कैसा अंजाम हुआ [80]!"
तमाम अम्बिया किराम का बुनियादी पैग़ाम तौहीद रहा है। इबादत उसी वक़्त मोअतबर होती है जब पहले ईमान सही हो; और ईमान की हिफ़ाज़त के लिए ताग़ूत (शैतान व कुफ़्र) से दूरी लाज़मी है।
जैसे सूरज की धूप से चमगादड़ फ़ायदा नहीं उठाता और बारिश से हर ज़मीन हरी नहीं होती, वैसे ही कुछ बदबख़्त रसूल की मौजूदगी के बावजूद अंधे बने रहे।
इब्रत हासिल करने के लिए तबाहशुदा बस्तियों के खण्डहरों को देखना जाइज़ है। इसी तरह जब अल्लाह के क़हर की जगहों को देखना जायज़ है, तो अल्लाह की रहमतों के मुशाहिदे के लिए बुज़ुर्गान-ए-दीन और औलिया-ए-किराम के मज़ारात की ज़ियारत करना बदर्जा-ए-औला मुस्तहसन और बाइस-ए-सवाब है।
तारीख़ और भूगोल का सही मक़सद अल्लाह की क़ुदरत और पिछली क़ौमों के अंजाम से नसीहत हासिल करना है।
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