Transliteration: (Awa lam yaraw ilaa maa khalaqal laahu min shai'iny-yatafaiya'u zilaaluhoo 'anil yameeni washshamaaa' ili sujjadal lillaahi wa hum daakhiroon)
"क्या उन्होंने अल्लाह की बनाई हुई किसी चीज़ को न देखा कि उसकी परछाइयाँ किस तरह दाएँ [100] और बाएँ झुकती हैं, अल्लाह को सजदा करती हुईं, और वे आजिज़ हैं [102]?"
हर चीज़ का साया सूरज की गर्दिश के ताबे है। सूरज पूरब में हो तो साया पश्चिम में, और दक्षिण में हो तो उत्तर में झुकता है। जब इन्सान अपनी परछाई को अपनी मर्ज़ी से मोड़ने पर क़ादिर नहीं, तो वह अल्लाह के हुक्म के आगे सरकशी क्यों करता है!
परछाइयों का ज़मीन पर झुकना अल्लाह की फ़रमाँबरदारी का इज़हार है; कायनात की हर मख़्लूक़ अपने-अपने तरीक़े पर अल्लाह के आगे सजदा-रेज़ है।
इन्सान तबीई और तख़्लीक़ी मामलात में बिल्कुल मजबूर है — जब वक़्त आता है सोता है, उठता है, जीता है और मरता है। जब वह प्राकृतिक क़ानून में इतना मजबूर है, तो उसे दीनी अहकाम में भी अल्लाह की इताअत करनी चाहिए।
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