कुरान - 16:56 सूरह अल-नहल अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

56
وَيَجۡعَلُونَ لِمَا لَا يَعۡلَمُونَ نَصِيبٗا مِّمَّا رَزَقۡنَٰهُمۡۗ تَٱللَّهِ لَتُسۡـَٔلُنَّ عَمَّا كُنتُمۡ تَفۡتَرُونَ

Transliteration: (Wa yaj'aloona limaa laa ya'lamoona naseebam mimmaa razaqnnaahum; tallaahi latus'alunaa 'ammaa kuntum taftaroon)

और वे हमारी दी हुई रोज़ी में से [111] उनका एक हिस्सा ऐसी चीज़ों (बुतों) के लिए ठहराते हैं जिनकी हक़ीक़त नहीं जानते [112]। अल्लाह की क़सम! तुमसे ज़रूर पूछ होगी उस बोहतान की जो तुम बाँधते थे [113]। (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अल-नहल आयत 56 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

सूरह अन-नह्ल – आयत 56 की तफ़सीर (तफ़सीरे नईमी)

"और वे हमारी दी हुई रोज़ी में से [111] उनका एक हिस्सा ऐसी चीज़ों के लिए ठहराते हैं जिनकी हक़ीक़त नहीं जानते [112]। अल्लाह की क़सम! तुमसे ज़रूर पूछ होगी उस बोहतान की जो तुम बाँधते थे [113]।"

[111] बेजान बुतों की पूजा

मुशरिक़ीन ऐसे बेबस पत्थरों को पूजते हैं जिनकी बे-हक़ीक़ती और ज़िल्लत को वे ख़ुद भी नहीं समझते।

[112] बुतों के चढ़ावे बनाम ईसाल-ए-सवाब

मुशरिक़ीन अपने जानवरों और खेती का हिस्सा बुतों के नाम मख़्सूस करते थे जो शिर्क है। इसके बरअक्स अगर मुसलमान अल्लाह की रज़ा के लिए ग़रीबों को खाना खिलाए और उसका सवाब औलिया-ए-किराम को पहुँचाए (नियाज़ व ईसाल-ए-सवाब), तो यह सदक़ा-ए-जायज़ा और सवाब का काम है।

[113] बुतों के माल का हुक्म

बुतों के नाम पर चीज़ मख़्सूस करना हराम है, मगर वह चीज़ (जैसे जानवर या ग़ल्ला) अपनी ज़ात में नापाक नहीं होती। अगर वह माल माले-ग़नीमत के ज़रिए मुसलमानों के हाथ आ जाए और अल्लाह के नाम पर ज़बह किया जाए, तो उसका इस्तेमाल हलाल है।

Sign up for Newsletter

×

Download Our Quran App

For a faster and smoother experience,
install our mobile app now.

Download Now