Transliteration: (Wa yaj'aloona limaa laa ya'lamoona naseebam mimmaa razaqnnaahum; tallaahi latus'alunaa 'ammaa kuntum taftaroon)
"और वे हमारी दी हुई रोज़ी में से [111] उनका एक हिस्सा ऐसी चीज़ों के लिए ठहराते हैं जिनकी हक़ीक़त नहीं जानते [112]। अल्लाह की क़सम! तुमसे ज़रूर पूछ होगी उस बोहतान की जो तुम बाँधते थे [113]।"
मुशरिक़ीन ऐसे बेबस पत्थरों को पूजते हैं जिनकी बे-हक़ीक़ती और ज़िल्लत को वे ख़ुद भी नहीं समझते।
मुशरिक़ीन अपने जानवरों और खेती का हिस्सा बुतों के नाम मख़्सूस करते थे जो शिर्क है। इसके बरअक्स अगर मुसलमान अल्लाह की रज़ा के लिए ग़रीबों को खाना खिलाए और उसका सवाब औलिया-ए-किराम को पहुँचाए (नियाज़ व ईसाल-ए-सवाब), तो यह सदक़ा-ए-जायज़ा और सवाब का काम है।
बुतों के नाम पर चीज़ मख़्सूस करना हराम है, मगर वह चीज़ (जैसे जानवर या ग़ल्ला) अपनी ज़ात में नापाक नहीं होती। अगर वह माल माले-ग़नीमत के ज़रिए मुसलमानों के हाथ आ जाए और अल्लाह के नाम पर ज़बह किया जाए, तो उसका इस्तेमाल हलाल है।
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