कुरान - 16:54 सूरह अल-नहल अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

54
ثُمَّ إِذَا كَشَفَ ٱلضُّرَّ عَنكُمۡ إِذَا فَرِيقٞ مِّنكُم بِرَبِّهِمۡ يُشۡرِكُونَ

Transliteration: (Summaa izaa kashafad durra 'ankum izaa fareequm minkum bi Rabbihim yushrikoon)

फिर जब वह तुमसे उस तकलीफ़ को दूर फ़रमा देता है, तो जब ही तुम में से एक गिरोह अपने रब का शरीक ठहराने लगता है [110]। (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अल-नहल आयत 54 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

सूरह अन-नह्ल – आयत 54 की तफ़सीर (तफ़सीरे नईमी)

"फिर जब वह तुमसे उस तकलीफ़ को दूर फ़रमा देता है, तो जब ही तुम में से एक गिरोह अपने रब का शरीक ठहराने लगता है [110]।"

[110] मुसीबत टलते ही मुशरिक़ाना रवैया

मुशरिक़ीन मुसीबत के वक़्त सिर्फ़ अल्लाह को पुकारते थे, मगर आफ़त टलते ही फिर बुतों की तरफ़ मुड़ जाते थे। याद रहे कि मुसीबत के वक़्त तबीब (डॉक्टर), हाकिम या अम्बिया व औलिया से बतौर वसीला व सबब मदद माँगना जाइज़ है; शिर्क तब होता है जब किसी को अल्लाह का शरीक या ख़ुद-मुख़्तार मान लिया जाए।

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