कुरान - 16:59 सूरह अल-नहल अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

59
يَتَوَٰرَىٰ مِنَ ٱلۡقَوۡمِ مِن سُوٓءِ مَا بُشِّرَ بِهِۦٓۚ أَيُمۡسِكُهُۥ عَلَىٰ هُونٍ أَمۡ يَدُسُّهُۥ فِي ٱلتُّرَابِۗ أَلَا سَآءَ مَا يَحۡكُمُونَ

Transliteration: (yatawaaraa minal qawmimin sooo'i maa bushshira bih; a-yumsikuhoo 'alaa hoonin am yadussuhoo fit turaab; alaa saaa'a maa yahkumoon)

लोगों से छिपा फिरता है उस बशारत की बुराई के सबब [117]; क्या उसे ज़िल्लत के साथ रखेगा [118] या उसे मिट्टी में दबा देगा [119]? सुन लो! कितना बुरा हुक्म लगाते हैं [120]! (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अल-नहल आयत 59 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

सूरह अन-नह्ल – आयत 59 की तफ़सीर (तफ़सीरे नईमी)

"लोगों से छिपा फिरता है उस बशारत की बुराई के सबब [117]; क्या उसे ज़िल्लत के साथ रखेगा [118] या उसे मिट्टी में दबा देगा [119]? सुन लो! कितना बुरा हुक्म लगाते हैं [120]!"

[117] बेटी को ऐब समझना जाहिलियत

अरब के जाहिल लोग बेटी की पैदाइश पर एक-दूसरे को ताने देते थे और इसे शर्म की बात समझते थे।

[118] ज़िंदा रखना ज़िल्लत समझना

वह सोचता था कि क्या उसे ज़लील हालत में पालूँ और लोगों की शर्मिंदगी उठाऊँ?

[119] बच्चियों को ज़िंदा दफ़्न करने का वहशियाना जुर्म

क़बीला मुज़िर, तमीम और ख़ोज़ाआ के बहुत से मुशरिक अपनी मासूम बच्चियों को ज़िंदा ज़मीन में दफ़्न कर देते थे, जो ज़ुल्म की इन्तिहा थी।

[120] अल्लाह की तरफ़ ऐब की निस्बत कुफ़्र है

जिस चीज़ को वे ख़ुद ज़िल्लत समझते थे, उसे अल्लाह की तरफ़ मन्सूब करते थे। इससे साबित हुआ कि अल्लाह तआला की तरफ़ किसी ऐब या नुक़्स (जैसे झूठ, कमज़ोरी या औलाद) की निस्बत करना कुफ़्र है।

Sign up for Newsletter

×

Download Our Quran App

For a faster and smoother experience,
install our mobile app now.

Download Now