कुरान - 16:61 सूरह अल-नहल अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

61
وَلَوۡ يُؤَاخِذُ ٱللَّهُ ٱلنَّاسَ بِظُلۡمِهِم مَّا تَرَكَ عَلَيۡهَا مِن دَآبَّةٖ وَلَٰكِن يُؤَخِّرُهُمۡ إِلَىٰٓ أَجَلٖ مُّسَمّٗىۖ فَإِذَا جَآءَ أَجَلُهُمۡ لَا يَسۡتَـٔۡخِرُونَ سَاعَةٗ وَلَا يَسۡتَقۡدِمُونَ

Transliteration: (Wa law yu'aakhizul laahun naasa bizulminhim maa taraka 'alaihaa min daaabbatinw wa laakiny yu'akhkhiruhum ilaaa ajalim musamman fa izaa jaaa'a ajaluhum laa yastaakhiroona saa'atanw wa laa yastaqdimoon)

और अगर अल्लाह लोगों को उनके ज़ुल्म पर पकड़ता [123], तो ज़मीन पर कोई रेंगने वाला जीव न छोड़ता [124], लेकिन वह उन्हें एक मुक़र्रर वक़्त तक ढील देता है [125]; फिर जब उनका वक़्त आ पहुँचेगा, तो न एक घड़ी पीछे हट सकेंगे और न आगे बढ़ सकेंगे [126]। (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अल-नहल आयत 61 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

सूरह अन-नह्ल – आयत 61 की तफ़सीर (तफ़सीरे नईमी)

"और अगर अल्लाह लोगों को उनके ज़ुल्म पर पकड़ता [123], तो ज़मीन पर कोई रेंगने वाला जीव न छोड़ता [124], लेकिन वह उन्हें एक मुक़र्रर वक़्त तक ढील देता है [125]; फिर जब उनका वक़्त आ पहुँचेगा, तो न एक घड़ी पीछे हट सकेंगे और न आगे बढ़ सकेंगे [126]।"

[123] गुनाहों की पादाश और मोहलत

अगर अल्लाह तआला इन्सानों के हर गुनाह पर फ़ौरन गिरफ़्त फ़रमाता, तो ज़मीन पर कोई जानदार बाक़ी न रहता; मगर उसकी रहमत का तक़ाज़ा है कि वह मुक़र्रर मुद्दत तक मोहलत देता है।

[124] इन्सानी गुनाहों का मख़्लूक़ पर असर

इन्सान के गुनाहों और नाफ़रमानियों की वजह से बारिश रुकती है और ज़मीन पर कहतसाली फैलती है जिससे बेज़बान जानवर भी तकलीफ़ में मुब्तला होते हैं।

[125] मुक़र्रर मुद्दत

हर इन्सान और क़ौम की मौत और अज़ाब का एक तयशुदा वक़्त लौह-ए-महफ़ूज़ में मुक़र्रर है।

[126] मौत का अटल वक़्त

जब मौत या हलाकत की मुक़र्ररा घड़ी आ जाती है, तो उसमें एक पल की भी ताख़ीर या तक़दीम मुमकिन नहीं होती।

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