कुरान - 16:64 सूरह अल-नहल अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

64
وَمَآ أَنزَلۡنَا عَلَيۡكَ ٱلۡكِتَٰبَ إِلَّا لِتُبَيِّنَ لَهُمُ ٱلَّذِي ٱخۡتَلَفُواْ فِيهِ وَهُدٗى وَرَحۡمَةٗ لِّقَوۡمٖ يُؤۡمِنُونَ

Transliteration: (Wa maaa anzalnaa 'alaikal Kitaaba illaa litubaiyina lahumul lazikh talafoo feehi wa hudanw wa rahmatal liqawminy yu'minoon)

और हमने आप पर यह किताब नहीं उतारी मगर इसलिए कि आप उनके सामने साफ़ बयान कर दें जिस बात में [132] वे झगड़ते थे [133], और ईमान वालों के लिए हिदायत और रहमत बनाकर [134]। (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अल-नहल आयत 64 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

सूरह अन-नह्ल – आयत 64 की तफ़सीर (तफ़सीरे नईमी)

"और हमने आप पर यह किताब नहीं उतारी मगर इसलिए कि आप उनके सामने साफ़ बयान कर दें जिस बात में वे झगड़ते थे [133], और ईमान वालों के लिए हिदायत और रहमत बनाकर [134]।"

[132] क़ुरआन का मक़सद और हुज़ूर ﷺ का बयान

क़ुरआन-ए-पाक सिर्फ़ हुज़ूर अकरम ﷺ के वास्ते से हिदायत और रहमत बनता है। रसूलुल्लाह ﷺ की सुन्नत और हदीस को छोड़कर क़ुरआन समझना गुमराही का सबब बनता है।

[133] तमाम इख़्तिलाफ़ात का फ़ैसला

क़ुरआन-ए-पाक दुनियावी और दीनी तमाम झगड़ों और इख़्तिलाफ़ात में फ़ैसला फ़रमाने वाली किताब है, बशर्ते कि हुज़ूर ﷺ की तफ़सीर और उलमा की रहनुमाई में समझा जाए।

[134] ईमान वालों के लिए ख़ास रहमत

हुज़ूर अकरम ﷺ की आम रहमत तमाम कायनात के लिए है (जिससे काफ़िरों को भी दुनियावी रिज़्क़ और अज़ाब से ताख़ीर मिलती है); और आपकी ख़ास रहमत सिर्फ़ ईमान वालों के लिए है (जिससे उन्हें ईमान, तक़वा और जन्नत की नेमतें अता होती हैं)।

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