Transliteration: (Wallaahu khalaqakum suma yatawaffaakum; wa minkum many-yuradu ilaaa arzalil 'umuri likai laa ya'lama ba'da 'ilmin shai'aa; innal laaha 'Aleemun Qadeer (section 9))
"और अल्लाह ने तुम्हें पैदा किया, फिर तुम्हें मौत देगा [147]। और तुम में से कोई सबसे निकम्मी उम्र की तरफ़ फेर दिया जाता है [148] कि जानने के बाद कुछ न जाने [149]..."
मौत के फ़रिश्ते सिर्फ़ ज़ाहिरी वसीला हैं, हक़ीक़त में जान निकालने और मौत देने वाला अल्लाह तआला ही है।
साठ साल के बाद की वह उम्र जिसमें ताक़त घट जाती है, हवास कमज़ोर पड़ जाते हैं और हाफ़िज़े में कमी आ जाती है। हज़रत इब्ने अब्बास फ़रमाते हैं कि कामिल मोमिन इस ज़हनी गिरावट से महफ़ूज़ रहता है, और बाज़ औलिया अल्लाह की याद में डूब जाने के सबब दुनियावी मामलात से बेख़बर हो जाते हैं।
इन्सानी ज़िन्दगी के पाँच दर्जे हैं: (1) तुफ़ूलियत (बचपन - 7 साल तक), (2) सिबयान (14 साल तक), (3) शबाब (जवानी - 30 साल तक), (4) कुहूलत (अधेड़ उम्र), और (5) शैख़ूख़त (बुढ़ापा)। ये बदलते हुए अहवाल साबित करते हैं कि इन्सान पूरी तरह अल्लाह के क़ाबू में है।
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