कुरान - 16:70 सूरह अल-नहल अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

70
وَٱللَّهُ خَلَقَكُمۡ ثُمَّ يَتَوَفَّىٰكُمۡۚ وَمِنكُم مَّن يُرَدُّ إِلَىٰٓ أَرۡذَلِ ٱلۡعُمُرِ لِكَيۡ لَا يَعۡلَمَ بَعۡدَ عِلۡمٖ شَيۡـًٔاۚ إِنَّ ٱللَّهَ عَلِيمٞ قَدِيرٞ

Transliteration: (Wallaahu khalaqakum suma yatawaffaakum; wa minkum many-yuradu ilaaa arzalil 'umuri likai laa ya'lama ba'da 'ilmin shai'aa; innal laaha 'Aleemun Qadeer (section 9))

और अल्लाह ने तुम्हें पैदा किया, फिर तुम्हें मौत देगा [147]। और तुम में से कोई सबसे निकम्मी (लाचार) उम्र की तरफ़ फेर दिया जाता है [148] कि जानने के बाद कुछ न जाने [149]। बेशक अल्लाह सब कुछ जानने वाला, क़ुदरत वाला है। (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अल-नहल आयत 70 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

सूरह अन-नह्ल – आयत 70 की तफ़सीर (तफ़सीरे नईमी)

"और अल्लाह ने तुम्हें पैदा किया, फिर तुम्हें मौत देगा [147]। और तुम में से कोई सबसे निकम्मी उम्र की तरफ़ फेर दिया जाता है [148] कि जानने के बाद कुछ न जाने [149]..."

[147] हयात व मौत अल्लाह के इख़्तियार में

मौत के फ़रिश्ते सिर्फ़ ज़ाहिरी वसीला हैं, हक़ीक़त में जान निकालने और मौत देने वाला अल्लाह तआला ही है।

[148] अरज़लिल उमुर (बुढ़ापे की लाचारी)

साठ साल के बाद की वह उम्र जिसमें ताक़त घट जाती है, हवास कमज़ोर पड़ जाते हैं और हाफ़िज़े में कमी आ जाती है। हज़रत इब्ने अब्बास फ़रमाते हैं कि कामिल मोमिन इस ज़हनी गिरावट से महफ़ूज़ रहता है, और बाज़ औलिया अल्लाह की याद में डूब जाने के सबब दुनियावी मामलात से बेख़बर हो जाते हैं।

[149] इन्सानी ज़िन्दगी के पाँच मराहिल

इन्सानी ज़िन्दगी के पाँच दर्जे हैं: (1) तुफ़ूलियत (बचपन - 7 साल तक), (2) सिबयान (14 साल तक), (3) शबाब (जवानी - 30 साल तक), (4) कुहूलत (अधेड़ उम्र), और (5) शैख़ूख़त (बुढ़ापा)। ये बदलते हुए अहवाल साबित करते हैं कि इन्सान पूरी तरह अल्लाह के क़ाबू में है।

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