कुरान - 16:71 सूरह अल-नहल अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

71
وَٱللَّهُ فَضَّلَ بَعۡضَكُمۡ عَلَىٰ بَعۡضٖ فِي ٱلرِّزۡقِۚ فَمَا ٱلَّذِينَ فُضِّلُواْ بِرَآدِّي رِزۡقِهِمۡ عَلَىٰ مَا مَلَكَتۡ أَيۡمَٰنُهُمۡ فَهُمۡ فِيهِ سَوَآءٌۚ أَفَبِنِعۡمَةِ ٱللَّهِ يَجۡحَدُونَ

Transliteration: (Wallaahu faddala ba'dakum 'alaa ba'din fir rizq; famal lazeena fuddiloo biraaaddee rizqihim 'alaa maa malakat aimaanuhum fahum feehi sawaaa'; afabini'matil laahi yajhadoon)

और अल्लाह ने रोज़ी में तुम में से एक को दूसरे पर बड़ाई दी [150]। तो जिन्हें बड़ाई दी गई है [151] वे अपनी रोज़ी अपने दासों (ग़ुलामों) को नहीं फेर देते कि वे सब उसमें बराबर हो जाएँ। तो क्या वे अल्लाह की नेमत का इनकार करते हैं [152]? (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अल-नहल आयत 71 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

सूरह अन-नह्ल – आयत 71 की तफ़सीर (तफ़सीरे नईमी)

"और अल्लाह ने रोज़ी में तुम में से एक को दूसरे पर बड़ाई दी [150]... तो क्या वे अल्लाह की नेमत का इनकार करते हैं [152]?"

[150] रिज़्क़ में तफ़ावुत (फ़र्क़) और हिकमत

अल्लाह तआला ने अपनी हिकमत से किसी को अमीर और किसी को ग़रीब बनाया ताकि दुनिया का कारबार और निज़ाम चल सके।

[151] शिर्क का अक़्ली और नफ़्सियाती रद्द

काफ़िर अपने ग़ुलामों और मातहतों को अपनी दौलत में बराबर का शरीक नहीं बनाते, तो फिर वे अल्लाह की मख़्लूक़ और उसके बन्दों को अल्लाह की खुदाई और इबादत में कैसे शरीक ठहराते हैं!

[152] नेमत-ए-इलाही का इनकार

अल्लाह की दी हुई दौलत और नेमतों को दूसरों के नाम मन्सूब करना अल्लाह की नेमत की खुली नाशुक्री और इनकार है।

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