Transliteration: (Wa law shaaa'al laahu laja'alakum ummmatanw waahidatanw wa laakiny yudillu many-yashaaa'u wa yahdee many-yashaaa'; wa latus'alunna 'ammaa kuntum ta'maloon)
"और अगर अल्लाह चाहता तो तुम सब को एक ही उम्मत बना देता [211], लेकिन वह जिसे चाहे भटकाए [212] और जिसे चाहे हिदायत फ़रमाए... [213]।"
अगर अल्लाह चाहता तो सबको ब-ज़ोर मुसलमान बना देता, मगर यह हिकमत-ए-इलाही के ख़िलाफ़ था। जैसे दुनिया में अमीर-ग़रीब, बीमार-तन्दुरुस्त हैं, वैसे ही आख़िरत में मोमिनों से जन्नत और मुनकिरों से दोज़ख़ आबाद होगी ताकि अल्लाह की रहमत और ग़ज़ब दोनों ज़ाहिर हों।
अल्लाह हिदायत की तौफ़ीक़ देता है या नाफ़रमान के दिल में बुराई का रुझान पैदा फ़रमा देता है जब वह ख़ुद कुफ़्र को चुनता है।
यह पूछ-ताछ हिसाब और अद्ल क़ायम करने के लिए होगी, क्योंकि अल्लाह हर चीज़ का इल्म पहले से रखता है।
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