Transliteration: (Wa awfoo bi Ahdil laahi izaa 'aahattum wa laa tanqudul aimaana ba'da tawkeedihaa wa qad ja'altumul laaha 'alaikum kafeelaa; innal laaha ya'lamu maa taf'aloon)
"और अल्लाह का अहद पूरा करो जब तुम कोई समझौता करो [203], और अपनी क़समों को उन्हें पक्का करने के बाद न तोड़ो [204] [205]..."
चाहे वह अहद अल्लाह और उसके रसूल ﷺ से हो, या किसी इन्सान से अल्लाह का नाम लेकर किया गया हो — इसमें तमाम जायज़ मुआहिदे शामिल हैं; जैसे निकाह का अहद या पीर व मुर्शिद से बैअत का अहद। निकाह के वक़्त कलिमा पढ़वाया जाता है ताकि यह मुआहिदा मज़बूत हो।
अल्लाह का नाम लेकर खाई गई क़सम को पक्का करने के बाद तोड़ना सख़्त गुनाह और हराम है।
अल्लाह को ज़ामिन बनाकर दूसरों का एतिमाद हासिल किया, इसलिए ऐसी क़सम को पूरा करना लाज़िम है। अगर जायज़ क़सम तोड़े तो कफ़्फ़ारा देना फ़र्ज़ है; अलबत्ता अगर किसी गुनाह की क़सम खा ली हो तो उस क़सम को तोड़ना और कफ़्फ़ारा अदा करना ज़रूरी है।
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