कुरान - 53:10 सूरह अन-नज्म अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

10
فَأَوۡحَىٰٓ إِلَىٰ عَبۡدِهِۦ مَآ أَوۡحَىٰ

Transliteration: (Fa awhaaa ilaa 'abdihee maaa awhaa)

फिर अल्लाह ने अपने (ख़ास) बंदे पर जो वह्य फ़रमाई, सो वह्य फ़रमाई [12] [13]! (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अन-नज्म आयत 10 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

सूरह अन-नज्म तफ़सीर - आयत 10

"फिर अल्लाह ने अपने (ख़ास) बंदे पर जो वह्य फ़रमाई, सो वह्य फ़रमाई [12] [13]!"


[12] अल्लाह तआला वह्य का हक़ीक़ी मंबा है

हज़रत मुफ़्ती अहमद यार ख़ान नईमी रहमतुल्लाह अलैह फ़रमाते हैं कि 'फ़-औहा इला अब्दिही' में ज़मीर अल्लाह तआला की तरफ़ फिरती है:

  • बग़ैर वासिते के वह्य: इस मुक़ाम पर हज़रत जिब्रील मौजूद नहीं थे, बल्कि अल्लाह तआला ने सीधे अपने महबूब बंदे मुहम्मद मुस्तफ़ा ﷺ के दिल पर वह्य नाज़िल फ़रमाई।

[13] शब-ए-मेअराज के राज़-ओ-नियाज़ और उलूम-ए-ग़ैब

हज़रत मुफ़्ती अहमद यार ख़ान नईमी रहमतुल्लाह अलैह फ़रमाते हैं कि 'मा औहा' (जो वह्य फ़रमाई) को पोशीदा रखकर इसकी अज़मत को ज़ाहिर फ़रमाया गया:

  • राज़-ए-महबूबियत: यानी वह ऐसे ग़ैबी राज़-ओ-नियाज़ थे जिन्हें अल्लाह और उसके रसूल ﷺ के सिवा कोई मख़लूक़ नहीं जान सकती। अल्लाह ने अपने नबी को वह तमाम उलूम अता फ़रमाए जो कायनात के किसी इंसान या फ़रिश्ते को हासिल नहीं।

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