कुरान - 53:11 सूरह अन-नज्म अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

11
مَا كَذَبَ ٱلۡفُؤَادُ مَا رَأَىٰٓ

Transliteration: (Maa kazabal fu'aadu maa ra aa)

दिल ने झूठ नहीं कहा जो कुछ उन्होंने (अपनी आँखों से) देखा [14]! (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अन-नज्म आयत 11 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

सूरह अन-नज्म तफ़सीर - आयत 11

"दिल ने झूठ नहीं कहा जो कुछ उन्होंने (अपनी आँखों से) देखा [14]!"


[14] दीदार-ए-इलाही की तस्दीक़ और क़ल्ब-ए-मुस्तफ़ा ﷺ का कमाल

हज़रत मुफ़्ती अहमद यार ख़ान नईमी रहमतुल्लाह अलैह फ़रमाते हैं कि हुज़ूर ﷺ ने अपनी आँखों से अल्लाह का दीदार किया और दिल ने उसकी गवाही दी:

  • मूसा (अलैहिस्सलाम) और हुज़ूर ﷺ में फ़र्क़: कोह-ए-तूर पर जब तजल्ली हुई तो हज़रत मूसा (अलैहिस्सलाम) बेहोश हो गए, मगर शब-ए-मेअराज हुज़ूर मुहम्मद मुस्तफ़ा ﷺ मुकम्मल होश व हवास और इस्तिक़ामत के साथ अपने रब के रूबरू रहे और आपकी आँखों ने साफ़ दीदार किया।
  • हज़रत आइशा (रज़ियल्लाहु अन्हा) का क़ौल: हज़रत आइशा (रज़ि.) ने जो 'ला तुद्रिकुहुल अब्सार' (आँखें उसे नहीं पा सकतीं) से दुनियावी दीदार की नफ़ी समझी थी, वह दुनिया की आम इंसानी आँखों के लिए है; जबकि हुज़ूर ﷺ को मेअराज में ख़ास जिस्मानी व रूहानी ताक़त अता फ़रमाकर यह शरफ़ बख़्शा गया। हज़रत इब्ने अब्बास (रज़ि.) और अक्सर सहाबा का यही अक़ीदा है।

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