कुरान - 27:14 सूरह अन-नम्ल अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

14
وَجَحَدُواْ بِهَا وَٱسۡتَيۡقَنَتۡهَآ أَنفُسُهُمۡ ظُلۡمٗا وَعُلُوّٗاۚ فَٱنظُرۡ كَيۡفَ كَانَ عَٰقِبَةُ ٱلۡمُفۡسِدِينَ

Transliteration: (Wa jahadoo bihaa wastaiqanat haaa anfusuhum zulmanw-wa 'uluwwaa; fanzur kaifa kaana 'aaqibatul mufsideen (section 1))

और उन्होंने ज़ुल्म और तकब्बुर के बाइस उनका इंकार किया [28], हालाँकि उनके दिलों को उनका पूरा यक़ीन हो चुका था; पस देख लो कि फ़साद फैलाने वालों का कैसा अंजाम हुआ [29]! (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अन-नम्ल आयत 14 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

तफ़सीर सूरह अन-नम्ल – आयत 14

"और उन्होंने ज़ुल्म और तकब्बुर से उनका इंकार किया [28], हालाँकि दिलों को यक़ीन हो चुका था; पस देख लो फ़सादियों का कैसा अंजाम हुआ [29]!"

[28] कुफ़्र-ए-इनादी: दिल में यक़ीन मगर ज़बान से इंकार

फ़िरऔन और उसकी क़ौम के दिल अंदर से पूरी तरह मुतमइन थे कि मूसा अलैहिस्सलाम अल्लाह के सच्चे पैग़म्बर हैं और यह अल्लाह ही का मोजिज़ा है। मगर ज़ुल्म, घमंड और बादशाही के छिन जाने के डर से उन्होंने ज़बान से इंकार किया। इसे 'कुफ़्र-ए-इनादी' कहते हैं।

[29] समंदर में ग़र्क़ाबी और इबरतनाक अंजाम

अल्लाह तआला ने उन ज़ालिमों और फ़सादियों को बहर-ए-क़ुलज़ुम में ग़र्क़ करके नेस्त व नाबूद कर दिया जो तमाम दुनिया के लिए क़ियामत तक इबरत का निशान है।

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