कुरान - 27:32 सूरह अन-नम्ल अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

32
قَالَتۡ يَـٰٓأَيُّهَا ٱلۡمَلَؤُاْ أَفۡتُونِي فِيٓ أَمۡرِي مَا كُنتُ قَاطِعَةً أَمۡرًا حَتَّىٰ تَشۡهَدُونِ

Transliteration: (Qaalat yaaa aiyuhal mala'u aftoonee fee amree maa kuntu qaati'atan amran hattaa tashhhadoon)

उस (मल्लिका) ने कहा, 'ऐ सरदाराने क़ौम! मेरे इस मामले में मुझे मशविरा दो [63]; मैं किसी मामले का क़तई फ़ैसला नहीं करती जब तक तुम मेरे पास मौजूद न हो (मेरी ताईद न करो)।' (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अन-नम्ल आयत 32 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

तफ़सीर सूरह अन-नम्ल – आयत 32

"उसने कहा, 'ऐ सरदाराने क़ौम! मेरे इस मामले में मुझे मशविरा दो [63]; मैं किसी मामले का फ़ैसला नहीं करती जब तक तुम मौजूद न हो।'"

[63] बिलक़ीस का तद्बुर और शूरा (मशविरे) का निज़ाम

मल्लिका बिलक़ीस निहायत अक़्लमन्द और दूर-अंदेश थी। उसने ख़त पढ़कर अपने दरबार के तीन सौ बारह (312) बड़े सरदारों और वज़ीरों को जमा किया और फ़रमाया कि यह बड़ा नाज़ुक मामला है, तुम लोग अपनी राय दो क्योंकि मेरी आदत है कि मैं किसी अहम मामले में तुम्हारी मौजूदगी और मशविरे के बग़ैर कोई आख़िरी फ़ैसला नहीं करती।

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