कुरान - 27:4 सूरह अन-नम्ल अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

4
إِنَّ ٱلَّذِينَ لَا يُؤۡمِنُونَ بِٱلۡأٓخِرَةِ زَيَّنَّا لَهُمۡ أَعۡمَٰلَهُمۡ فَهُمۡ يَعۡمَهُونَ

Transliteration: (Innal lazeena laa yu'minoona bil Aakhirati zaiyannaa lahum a'maalahum fahum ya'mahoon)

बेशक जो लोग आख़िरत पर ईमान नहीं रखते, हमने उनके आमाल को उनकी नज़रों में ख़ुशनुमा (आकर्षक) बना दिया है [6], पस वे भटकते फिरते हैं [7]; (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अन-नम्ल आयत 4 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

तफ़सीर सूरह अन-नम्ल – आयत 4

"बेशक जो लोग आख़िरत पर ईमान नहीं रखते, हमने उनके आमाल को ख़ुशनुमा बना दिया है [6], पस वे भटकते फिरते हैं [7];"

[6] काफ़िरों की नज़रों में उनके बुरे आमाल का सँवरना

जो लोग आख़िरत का इंकार करते हैं, उनकी सज़ा यह होती है कि उनके बुरे और मुफ़्सिद काम भी उन्हें बहुत अच्छे और अक़्लमंदी वाले दिखाई देते हैं। वे अपनी गुमराही को ही तरक़्क़ी और कामयाबी समझते हैं।

[7] 'यहमहून' (हैबत व सरगर्दां होकर भटकना)

वे शक, तरद्दुद और गुमराही के अंधेरों में अंधे होकर ठोकरें खाते फिरते हैं और उन्हें सुकून-ए-क़ल्ब की दौलत कभी नसीब नहीं होती।

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