कुरान - 27:3 सूरह अन-नम्ल अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

3
ٱلَّذِينَ يُقِيمُونَ ٱلصَّلَوٰةَ وَيُؤۡتُونَ ٱلزَّكَوٰةَ وَهُم بِٱلۡأٓخِرَةِ هُمۡ يُوقِنُونَ

Transliteration: (Allazeena yuqeemoonas Salaata wa yu'toonaz Zakaata wa hum bil Aakhirati hum yooqinoon)

जो नमाज़ क़ायम करते हैं [3] और ज़कात अदा करते हैं [4], और वे आख़िरत पर कामिल यक़ीन रखते हैं [5]। (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अन-नम्ल आयत 3 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

तफ़सीर सूरह अन-नम्ल – आयत 3

"जो नमाज़ क़ायम करते हैं [3] और ज़कात अदा करते हैं [4], और वे आख़िरत पर कामिल यक़ीन रखते हैं [5]।"

[3] हुज़ूरी-ए-क़ल्ब के साथ पाबंदी से नमाज़ क़ायम करना

नमाज़ क़ायम करने का मतलब यह है कि उसके तमाम अरकान, शराइत, मुस्तहब्बात और हुज़ूरी-ए-क़ल्ब के साथ वक़्त पर बा-जमाअत अदा की जाए और अमली ज़िन्दगी में बुराई व बेहयाई से बचा जाए।

[4] ख़ुशी और शुक्रगुज़ारी के साथ ज़कात की अदायगी

वे अपने पाक माल से ख़ुशी-ख़ुशी मुस्तहिक़्क़ीन को ज़कात देते हैं और इसे अल्लाह का एहसान समझते हैं कि उसने उन्हें देने वाला बनाया, लेने वाला नहीं।

[5] यौम-ए-आख़िरत पर कामिल ईमान

वे मरने के बाद दोबारा ज़िन्दा होने, आमाल के हिसाब-किताब, मीज़ान, पुल-सिरात और जन्नत व दोज़ख़ पर ऐसा पुख़्ता यक़ीन रखते हैं गोया अपनी आंखों से देख रहे हों।

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