कुरान - 27:40 सूरह अन-नम्ल अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

40
قَالَ ٱلَّذِي عِندَهُۥ عِلۡمٞ مِّنَ ٱلۡكِتَٰبِ أَنَا۠ ءَاتِيكَ بِهِۦ قَبۡلَ أَن يَرۡتَدَّ إِلَيۡكَ طَرۡفُكَۚ فَلَمَّا رَءَاهُ مُسۡتَقِرًّا عِندَهُۥ قَالَ هَٰذَا مِن فَضۡلِ رَبِّي لِيَبۡلُوَنِيٓ ءَأَشۡكُرُ أَمۡ أَكۡفُرُۖ وَمَن شَكَرَ فَإِنَّمَا يَشۡكُرُ لِنَفۡسِهِۦۖ وَمَن كَفَرَ فَإِنَّ رَبِّي غَنِيّٞ كَرِيمٞ

Transliteration: (Qaalal lazee indahoo 'ilmum minal Kitaabi ana aateeka bihee qabla ai yartadda ilaika tarfuk; falammaa ra aahu mustaqirran 'indahoo qaala haazaa min fadli Rabbee li yabluwaneee 'a-ashkuru am akfuru wa man shakara fa innamaa yashkuru linafsihee wa man kafara fa inna Rabbee Ghaniyyun Kareem)

उसने कहा जिसके पास आसमानी किताब का इल्म था [78], 'मैं उसे आपके पास पलक झपकने से पहले ले आऊंगा [79]!' फिर जब सुलैमान ने उसे अपने पास रखा हुआ देखा, तो फ़रमाया, 'यह मेरे रब का फ़ज़्ल है [80], ताकि वह मुझे आज़माए कि मैं शुक्र अदा करता हूँ या ना-शुक्री [81]! और जो कोई शुक्र करता है वह अपने ही भले के लिए शुक्र करता है, और जो कोई ना-शुक्री करता है तो बेशक मेरा रब बे-नियाज़, निहायत करम फ़रमाने वाला है।' (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अन-नम्ल आयत 40 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

तफ़सीर सूरह अन-नम्ल – आयत 40

"उसने कहा जिसके पास किताब का इल्म था [78], 'मैं उसे पलक झपकने से पहले ले आऊंगा [79]!' फिर जब उसे रखा देखा तो फ़रमाया: 'यह मेरे रब का फ़ज़्ल है [80], ताकि आज़माए कि मैं शुक्र करता हूँ या ना-शुक्री [81]!...'"

[78] हज़रत आसिफ़ बिन बरख़िया रज़ियल्लाहु अन्हु और करामात-ए-औलिया

हज़रत सुलैमान ने फ़रमाया कि मुझे इससे भी जल्दी चाहिए। इस पर आपके वज़ीर और मुक़र्रब ख़लीफ़ा हज़रत आसिफ़ बिन बरख़िया (जो अल्लाह के वली थे और जिन्हें 'इस्मे-आज़म' का इल्म हासिल था) ने अर्ज़ किया। इससे साबित हुआ कि अल्लाह के औलिया को अल्लाह तआला ऐसी रूहानी ताक़त (करामात) अता फ़रमाता है जो जिन्नात की ताक़त से भी हज़ारों गुना बढ़कर होती है।

[79] 'क़बला अय्यर्तद्दा इलैका तरफ़ुक' (पलक झपकने से पहले पंद्रह सौ मील से तख़्त हाज़िर होना)

हज़रत आसिफ़ ने वुज़ू फ़रमा कर इस्मे-आज़म के साथ दुआ की, तो अल्लाह ने ज़मीन को उनके लिए समेट दिया और यमन के महलों के सातों कमरों में बन्द वह अज़ीम तख़्त एक लम्हे में ज़मीन के नीचे-नीचे आकर हज़रत सुलैमान के सामने नमूदार हो गया!

[80] हज़रत सुलैमान की आजिज़ाना शुक्रगुज़ारी

तख़्त को सामने मौजूद देखकर हज़रत सुलैमान ने अपने वज़ीर की करामात और अल्लाह की इस अज़ीम क़ुदरत पर शुक्र अदा करते हुए फ़रमाया: 'यह महज़ मेरे रब का फ़ज़्ल व एहसान है।'

[81] नेमतों की आज़माइश और शुक्र का फ़ायदा

फ़रमाया कि अल्लाह नेमतें देकर आज़माता है कि बन्दा शुक्रगुज़ार रहता है या ना-शुक्रा बन जाता है। शुक्र करने से बन्दे का अपना ही भला और नेमतों में इज़ाफ़ा होता है, और अल्लाह तमाम जहानों से बे-परवाह और निहायत करीम है।

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