Transliteration: (Qeela lahad khulis sarha falammaa ra at hu hasibat hu lujjatanw wa kashafat 'an saaqaihaa; qaala innahoo sarhum mumarradum min qawaareer; qaalat Rabbi innee zalamtu nafsee wa aslamtu ma'a Sulaimaana lillaahi Rabbil 'aalameen (section 3))
"कहा गया, 'महल में दाख़िल होइए।' उसने देखा तो गहरा पानी समझा और पिंडलियां खोल लीं। फ़रमाया: 'यह शीशे का फ़र्श है।' उसने कहा: 'ऐ रब! मैंने ज़ुल्म किया, और मैं सुलैमान के साथ अल्लाह के हुज़ूर मुस्लिम होती हूँ [86]।'"
हज़रत सुलैमान अलैहिस्सलाम ने एक निहायत अज़ीमुश्शान महल बनवाया था जिसके सहन में पानी का तेज़ हौज था जिसमें रंग-बिरंगी मछलियां तैर रही थीं, और उसके ऊपर बिल्कुल साफ़, शफ़्फ़ाफ़ और मोटा शीशा मढ़ दिया गया था।
जब बिलक़ीस महल में दाख़िल हुई तो उसने समझा कि गहरा पानी बह रहा है, चुनांचे पानी में भीगने से बचने के लिए उसने अपनी पोशाक पिंडलियों तक उठा ली। हज़रत सुलैमान ने फ़रमाया: 'यह पानी नहीं, बल्कि शीशे का चिकना फ़र्श है।'
बिलक़ीस ने जब देखा कि सुलैमान की यह शान किसी दुनियावी हुक्मरां की नहीं बल्कि नबी-ए-बरहक़ की है, तो उसने फ़ौरन अपने माज़ी के कुफ़्र व शिर्क से तौबा की और सच्चे दिल से हज़रत सुलैमान के हाथ पर इस्लाम क़बूल करके अल्लाह की फ़रमांबरदार बन गई।
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