Transliteration: (Ammann ja'alal arda qaraaranw wa ja'ala khilaalahaaa anhaaranw wa ja'ala lahaa rawaasiya wa ja'ala bainal bahraini haajizaa; 'a-ilaahun ma'allah; bal aksaruhum laa ya'lamoon)
"भला वह कौन है जिसने ज़मीन को ठहरने की जगह बनाया [117] और उसके दरमियान नहरें जारी कीं, और उसके लिए लंगर [118] (पहाड़) बनाए और दो समुंदरों के दरमियान एक ओट (रुकावट) [119] बना दी? क्या अल्लाह के साथ कोई और माबूद है? बल्कि उनमें से अक्सर लोग बे-इल्म हैं [120]।"
यानी तुम सब ज़मीन पर आबाद हो और ज़मीन ऐसी ठहरी हुई है जिसमें हरकत व लरज़ा नहीं; वरना तुम इस पर चैन व सुकून से न बस सकते। अगर ज़मीन हर वक़्त डोलती और कांपती रहती तो पूरी ज़िंदगी का निज़ाम दरहम-बरहम हो जाता। पस ज़मीन का यह सुकून व इस्तिहकाम अल्लाह तआला का अज़ीम एहसान है जिसने ज़िंदगी को मुम्किन बनाया।
यानी ज़मीन पानी की सतह पर तैरते हुए जहाज़ की मानिंद थी जिसमें हरकत और डोलना था। पस अल्लाह तआला ने उस पर भारी-भरकम पहाड़ क़ायम फ़रमाए ताकि उनके भारी बोझ से ज़मीन को ठहराव व सुकून हासिल हो जाए।
जिस तरह समुंदर में जहाज़ का लंगर गिराने से उसकी हरकत रुक जाती है, उसी तरह पहाड़ ज़मीन के लिए लंगर का काम करते हैं।
यानी मीठे और नमकीन दो समुंदर साथ-साथ बहते हैं मगर कुदरत की ओट व रुकावट की वजह से आपस में नहीं मिलते और न एक-दूसरे का ज़ायका ख़राब करते हैं। यह अल्लाह तआला की कमाल-ए-कुदरत का खुला सबूत है।
यानी मुशरिकीन इन खुले मुशाहिदात और अफ़आल-ए-इलाहिया को देखने के बावजूद तौहीद को नहीं समझते और अल्लाह की ज़ात व सिफ़ात में ग़ैरों को शरीक ठहराते हैं, क्योंकि वे सच्ची समझ और इल्म से महरूम हैं।
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