कुरान - 27:61 सूरह अन-नम्ल अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

61
أَمَّن جَعَلَ ٱلۡأَرۡضَ قَرَارٗا وَجَعَلَ خِلَٰلَهَآ أَنۡهَٰرٗا وَجَعَلَ لَهَا رَوَٰسِيَ وَجَعَلَ بَيۡنَ ٱلۡبَحۡرَيۡنِ حَاجِزًاۗ أَءِلَٰهٞ مَّعَ ٱللَّهِۚ بَلۡ أَكۡثَرُهُمۡ لَا يَعۡلَمُونَ

Transliteration: (Ammann ja'alal arda qaraaranw wa ja'ala khilaalahaaa anhaaranw wa ja'ala lahaa rawaasiya wa ja'ala bainal bahraini haajizaa; 'a-ilaahun ma'allah; bal aksaruhum laa ya'lamoon)

भला वह कौन है जिसने ज़मीन को ठहरने की जगह बनाया [117] और उसके दरमियान नहरें जारी कीं, और उसके लिए लंगर [118] (पहाड़) बनाए और दो समुंदरों के दरमियान एक ओट (रुकावट) [119] बना दी? क्या अल्लाह के साथ कोई और माबूद है? बल्कि उनमें से अक्सर लोग बे-इल्म हैं [120]। (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अन-नम्ल आयत 61 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

सूरह अन-नम्ल तफ़सीर - आयत 61

"भला वह कौन है जिसने ज़मीन को ठहरने की जगह बनाया [117] और उसके दरमियान नहरें जारी कीं, और उसके लिए लंगर [118] (पहाड़) बनाए और दो समुंदरों के दरमियान एक ओट (रुकावट) [119] बना दी? क्या अल्लाह के साथ कोई और माबूद है? बल्कि उनमें से अक्सर लोग बे-इल्म हैं [120]।"

[117] ज़मीन को क़रारगाह और आबाद रहने योग्य बनाना

यानी तुम सब ज़मीन पर आबाद हो और ज़मीन ऐसी ठहरी हुई है जिसमें हरकत व लरज़ा नहीं; वरना तुम इस पर चैन व सुकून से न बस सकते। अगर ज़मीन हर वक़्त डोलती और कांपती रहती तो पूरी ज़िंदगी का निज़ाम दरहम-बरहम हो जाता। पस ज़मीन का यह सुकून व इस्तिहकाम अल्लाह तआला का अज़ीम एहसान है जिसने ज़िंदगी को मुम्किन बनाया।

[118] पहाड़ों को ज़मीन का लंगर बनाना

यानी ज़मीन पानी की सतह पर तैरते हुए जहाज़ की मानिंद थी जिसमें हरकत और डोलना था। पस अल्लाह तआला ने उस पर भारी-भरकम पहाड़ क़ायम फ़रमाए ताकि उनके भारी बोझ से ज़मीन को ठहराव व सुकून हासिल हो जाए।
जिस तरह समुंदर में जहाज़ का लंगर गिराने से उसकी हरकत रुक जाती है, उसी तरह पहाड़ ज़मीन के लिए लंगर का काम करते हैं।

[119] दो समुंदरों के दरमियान रुकावट (हाइज़)

यानी मीठे और नमकीन दो समुंदर साथ-साथ बहते हैं मगर कुदरत की ओट व रुकावट की वजह से आपस में नहीं मिलते और न एक-दूसरे का ज़ायका ख़राब करते हैं। यह अल्लाह तआला की कमाल-ए-कुदरत का खुला सबूत है।

[120] अक्सरियात की बे-इल्मी

यानी मुशरिकीन इन खुले मुशाहिदात और अफ़आल-ए-इलाहिया को देखने के बावजूद तौहीद को नहीं समझते और अल्लाह की ज़ात व सिफ़ात में ग़ैरों को शरीक ठहराते हैं, क्योंकि वे सच्ची समझ और इल्म से महरूम हैं।

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