कुरान - 27:81 सूरह अन-नम्ल अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

81
وَمَآ أَنتَ بِهَٰدِي ٱلۡعُمۡيِ عَن ضَلَٰلَتِهِمۡۖ إِن تُسۡمِعُ إِلَّا مَن يُؤۡمِنُ بِـَٔايَٰتِنَا فَهُم مُّسۡلِمُونَ

Transliteration: (Wa maaa anta bihaadil 'umyi 'an dalaalatihim in tusmi'u illaa mai yu'minu bi aayaatinaa fahum muslimoon)

और न आप अंधों को उनकी गुमराही से (निकाल कर) राह दिखाने वाले हैं [147]; आप तो बस उन्हीं को सुना सकते हैं जो हमारी आयात पर ईमान लाते हैं, फिर वे फ़रमांबरदार (मुस्लिम) हो जाते हैं [148]। (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अन-नम्ल आयत 81 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

सूरह अन-नम्ल तफ़सीर - आयत 81

"और न आप अंधों को उनकी गुमराही से (निकाल कर) राह दिखाने वाले हैं [147]; आप तो बस उन्हीं को सुना सकते हैं जो हमारी आयात पर ईमान लाते हैं, फिर वे फ़रमांबरदार (मुस्लिम) हो जाते हैं [148]।"

[147] रूहानी अंधों का हिदायत से महरूम रहना

इससे मुराद वे लोग हैं जिनके दिलों पर कुफ़्र की स्याही छा चुकी है। ज़ाहिरी आँखें रखने के बावजूद वे हक़ की निशानियों और मोजिज़ात को देखने से अंधे हैं। जो ख़ुद ही अंधा बने रहना चाहे उसे कोई राह नहीं दिखा सकता।

[148] मोमिनीन की हक़-पज़ीरी

यानी कलाम-ए-इलाही और नसीहत से वही लोग फ़ायदा उठाते हैं जिनकी क़िस्मत में ईमान की दौलत लिखी है। वे आयात को सुनते ही तस्दीक़ करते हैं और पूरे इख़्लास के साथ अल्लाह के फ़रमांबरदार बन जाते हैं।

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