Transliteration: (Wa maaa anta bihaadil 'umyi 'an dalaalatihim in tusmi'u illaa mai yu'minu bi aayaatinaa fahum muslimoon)
"और न आप अंधों को उनकी गुमराही से (निकाल कर) राह दिखाने वाले हैं [147]; आप तो बस उन्हीं को सुना सकते हैं जो हमारी आयात पर ईमान लाते हैं, फिर वे फ़रमांबरदार (मुस्लिम) हो जाते हैं [148]।"
इससे मुराद वे लोग हैं जिनके दिलों पर कुफ़्र की स्याही छा चुकी है। ज़ाहिरी आँखें रखने के बावजूद वे हक़ की निशानियों और मोजिज़ात को देखने से अंधे हैं। जो ख़ुद ही अंधा बने रहना चाहे उसे कोई राह नहीं दिखा सकता।
यानी कलाम-ए-इलाही और नसीहत से वही लोग फ़ायदा उठाते हैं जिनकी क़िस्मत में ईमान की दौलत लिखी है। वे आयात को सुनते ही तस्दीक़ करते हैं और पूरे इख़्लास के साथ अल्लाह के फ़रमांबरदार बन जाते हैं।
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