Transliteration: (Wa Yawma yunfakhu fis Soori fafazi'a man fis samaawaati wa man fil ardi illaa man shaaa'al laah; wa kullun atawhu daakhireen)
"और जिस दिन सूर फूंका जाएगा [159], तो जितने आसमानों में हैं और जितने ज़मीन में हैं सब घबरा उठेंगे (दहशतज़दा हो जाएंगे) [160], सिवाय उसके जिसे अल्लाह चाहे [161]; और सब के सब आजिज़ व फ़रमांबरदार होकर उसके हुज़ूर हाज़िर होंगे [162]।"
सूर का पहला फूंकना कायनात की फ़ना के लिए होगा जिससे सारी मख़लूक़ हलाक हो जाएगी, और दूसरा फूंकना दोबारा ज़िंदा होने (हश्र) के लिए होगा जिससे सब उठ खड़े होंगे।
सूर की हैबतनाक आवाज़ से आसमानों और ज़मीन की तमाम मख़लूक़ात ख़ौफ़ज़दा हो जाएंगी। पहली फूंक पर यह मौत की दहशत होगी, और दूसरी फूंक पर क़ियामत की होलनाकियों का ख़ौफ़ होगा।
इससे मुराद अल्लाह के मुक़र्रब बंदे—अंबिया-ए-किराम, शोहदा, औलिया और ख़ास फ़रिश्ते—हैं जिन्हें अल्लाह तआला उस दिन की दहशत और घबराहट से महफ़ूज़ फ़रमाएगा। जैसा कि फ़रमाया: "बड़ी घबराहट उन्हें रंजीदा न करेगी।"
यानी उस दिन हर शख़्स लाचार व बेबस होकर अल्लाह की अदालत में पेश होगा:
बाज़ सज़ा भुगतने के लिए,
बाज़ इनाम व इकराम पाने के लिए,
बाज़ मग़फ़िरत व बख़्शिश के लिए,
और बाज़ शफ़ाअत फ़रमाने और दूसरों की बख़्शिश कराने के लिए।
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