Transliteration: (Wa yaqooloona aamannaa billaahi wa bir Rasooli wa ata'naa summa yatawallaa fareequm minhum mim ba'di zaalik; wa maaa ulaaa'ika bilmu'mineen)
"और वे कहते हैं, 'हम अल्लाह और रसूल पर ईमान लाए और फ़रमांबरदारी क़बूल की,' फिर उनमें से एक गिरोह मुंह फेर लेता है [130]; और ऐसे लोग हरगिज़ सच्चे मोमिन नहीं हैं [131]।"
यह मुनाफ़िक़ों की सिफ़त बयान हो रही है जो ज़बान से तो ईमान और इताअत का दम भरते थे, लेकिन जब अमली आज़माइश का वक़्त आता तो शरीअत के अहकाम से मुंह फेर लेते थे।
अल्लाह तआला ने साफ़ फ़रमा दिया कि जो लोग रसूल के फ़ैसलों और अहकाम से कतराते हैं, वे हरगिज़ सच्चे मोमिन नहीं हो सकते। ईमान इताअत-ए-रसूल का नाम है।
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