कुरान - 24:47 सूरह अन-नूर अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

47
وَيَقُولُونَ ءَامَنَّا بِٱللَّهِ وَبِٱلرَّسُولِ وَأَطَعۡنَا ثُمَّ يَتَوَلَّىٰ فَرِيقٞ مِّنۡهُم مِّنۢ بَعۡدِ ذَٰلِكَۚ وَمَآ أُوْلَـٰٓئِكَ بِٱلۡمُؤۡمِنِينَ

Transliteration: (Wa yaqooloona aamannaa billaahi wa bir Rasooli wa ata'naa summa yatawallaa fareequm minhum mim ba'di zaalik; wa maaa ulaaa'ika bilmu'mineen)

और वे कहते हैं, 'हम अल्लाह पर और रसूल पर ईमान लाए और हमने फ़रमांबरदारी क़बूल की,' फिर उनमें से एक गिरोह इसके बाद मुंह फेर लेता है [130]; और ऐसे लोग हरगिज़ सच्चे मोमिन नहीं हैं [131]। (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अन-नूर आयत 47 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

तफ़सीर सूरह अन-नूर – आयत 47

"और वे कहते हैं, 'हम अल्लाह और रसूल पर ईमान लाए और फ़रमांबरदारी क़बूल की,' फिर उनमें से एक गिरोह मुंह फेर लेता है [130]; और ऐसे लोग हरगिज़ सच्चे मोमिन नहीं हैं [131]।"

[130] मुनाफ़िक़ों का दोहरा रवैया

यह मुनाफ़िक़ों की सिफ़त बयान हो रही है जो ज़बान से तो ईमान और इताअत का दम भरते थे, लेकिन जब अमली आज़माइश का वक़्त आता तो शरीअत के अहकाम से मुंह फेर लेते थे।

[131] महज़ ज़बानी दावे से कोई मोमिन नहीं बनता

अल्लाह तआला ने साफ़ फ़रमा दिया कि जो लोग रसूल के फ़ैसलों और अहकाम से कतराते हैं, वे हरगिज़ सच्चे मोमिन नहीं हो सकते। ईमान इताअत-ए-रसूल का नाम है।

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