Transliteration: (Wa izaa du'ooo ilal laahi wa Rasoolihee li yahkuma bainahum izaa fareequm minhum mu'ridoon)
"और जब उन्हें अल्लाह और रसूल की तरफ़ बुलाया जाता है [132] ताकि रसूल फ़ैसला फ़रमाएं, तो अचानक एक गिरोह मुंह फेर लेता है [133]।"
मुसलमानों का बाहमी झगड़ा तय करने के लिए जब उन्हें हुज़ूर नबी-ए-करीम ﷺ की मुक़द्दस अदालत की तरफ़ बुलाया जाता था,
तो मुनाफ़िक़ लोग (जैसे बिश्र मुनाफ़िक़) जानते थे कि हुज़ूर ﷺ कभी रिशवत या तरफ़दारी नहीं फ़रमाते बल्कि ख़ालिस हक़ व इंसाफ़ का फ़ैसला करते हैं, इसलिए वे नबवी अदालत में जाने से कतराते थे और ग़ैर-मुस्लिम सरदारों के पास जाना चाहते थे।
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