कुरान - 24:48 सूरह अन-नूर अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

48
وَإِذَا دُعُوٓاْ إِلَى ٱللَّهِ وَرَسُولِهِۦ لِيَحۡكُمَ بَيۡنَهُمۡ إِذَا فَرِيقٞ مِّنۡهُم مُّعۡرِضُونَ

Transliteration: (Wa izaa du'ooo ilal laahi wa Rasoolihee li yahkuma bainahum izaa fareequm minhum mu'ridoon)

और जब उन्हें अल्लाह और उसके रसूल की तरफ़ बुलाया जाता है [132] ताकि रसूल उनके दरमियान फ़ैसला फ़रमाएं, तो अचानक उनमें से एक गिरोह मुंह फेर लेता है [133]; (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अन-नूर आयत 48 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

तफ़सीर सूरह अन-नूर – आयत 48

"और जब उन्हें अल्लाह और रसूल की तरफ़ बुलाया जाता है [132] ताकि रसूल फ़ैसला फ़रमाएं, तो अचानक एक गिरोह मुंह फेर लेता है [133]।"

[132] अदालत-ए-नबवी की तरफ़ दावत

मुसलमानों का बाहमी झगड़ा तय करने के लिए जब उन्हें हुज़ूर नबी-ए-करीम ﷺ की मुक़द्दस अदालत की तरफ़ बुलाया जाता था,

[133] मुकद्दमे से मुनाफ़िक़ों का गुरेज़

तो मुनाफ़िक़ लोग (जैसे बिश्र मुनाफ़िक़) जानते थे कि हुज़ूर ﷺ कभी रिशवत या तरफ़दारी नहीं फ़रमाते बल्कि ख़ालिस हक़ व इंसाफ़ का फ़ैसला करते हैं, इसलिए वे नबवी अदालत में जाने से कतराते थे और ग़ैर-मुस्लिम सरदारों के पास जाना चाहते थे।

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