कुरान - 24:50 सूरह अन-नूर अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

50
أَفِي قُلُوبِهِم مَّرَضٌ أَمِ ٱرۡتَابُوٓاْ أَمۡ يَخَافُونَ أَن يَحِيفَ ٱللَّهُ عَلَيۡهِمۡ وَرَسُولُهُۥۚ بَلۡ أُوْلَـٰٓئِكَ هُمُ ٱلظَّـٰلِمُونَ

Transliteration: (Afee quloobihim maradun amirtaabooo am yakhaafoona any yaheefallaahu 'alaihim wa Rasooluh; bal ulaaa'ika humuz zaalimoon (section 6))

क्या उनके दिलों में बीमारी है? या वे इस बात से डरते हैं कि अल्लाह और उसका रसूल उन पर कोई बे-इंसाफ़ी करेंगे [134]? नहीं, बल्कि वे खुद ही बड़े ज़ालिम हैं [135]! (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अन-नूर आयत 50 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

तफ़सीर सूरह अन-नूर – आयत 50

"क्या उनके दिलों में बीमारी है? या डरते हैं कि अल्लाह और उसका रसूल बे-इंसाफ़ी करेंगे [134]? नहीं, बल्कि वे खुद ही ज़ालिम हैं [135]!"

[134] दिलों का निफ़ाक़ और बातिल ख़दशात

उनके दिलों में कुफ़्र व निफ़ाक़ की रूहानी बीमारी थी। क्या वे यह गुमान करते थे कि अल्लाह का मासूम व मुक़द्दस रसूल किसी के साथ नाइंसाफ़ी कर सकता है? यह ख़याल ही कुफ़्र है।

[135] अस्ल ज़ालिम मुनाफ़िक़ ख़ुद हैं

अल्लाह और उसका रसूल तो अदल व इंसाफ़ के पैकर हैं, अस्ल ज़ालिम और हक़मार वे ख़ुद हैं जो दूसरों का हक़ दबाना चाहते हैं और इंसाफ़ से भागते हैं।

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