Transliteration: (Innamaa kaana qawlal mu'mineena izaa du'ooo ilal laahi wa Rasoolihee li yahkuma bainahum ai yaqooloo sami'naa wa ata'naa; wa ulaaa'ika humul muflihoon)
"सच्चे मोमिनों की बात तो बस यह है कि जब अल्लाह और रसूल की तरफ़ बुलाया जाए ताकि फ़ैसला फ़रमाएं, तो वे कहते हैं: 'हमने सुना और इताअत की;' और यही लोग कामयाब हैं [136]।"
सच्चे मोमिन की पहचान यह है कि रसूलुल्लाह ﷺ का फ़रमान सुनते ही सर-ए-तस्लीम ख़म कर देता है, चाहे फ़ैसला उसके ज़ाती नफ़ा में हो या नुक़सान में। जो लोग अपनी मर्ज़ी को रसूल की मर्ज़ी के ताबे कर देते हैं, वही दोनों जहाँ में हक़ीक़ी कामियाबी पाने वाले हैं।
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