कुरान - 24:51 सूरह अन-नूर अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

51
إِنَّمَا كَانَ قَوۡلَ ٱلۡمُؤۡمِنِينَ إِذَا دُعُوٓاْ إِلَى ٱللَّهِ وَرَسُولِهِۦ لِيَحۡكُمَ بَيۡنَهُمۡ أَن يَقُولُواْ سَمِعۡنَا وَأَطَعۡنَاۚ وَأُوْلَـٰٓئِكَ هُمُ ٱلۡمُفۡلِحُونَ

Transliteration: (Innamaa kaana qawlal mu'mineena izaa du'ooo ilal laahi wa Rasoolihee li yahkuma bainahum ai yaqooloo sami'naa wa ata'naa; wa ulaaa'ika humul muflihoon)

सच्चे मोमिनों की बात तो बस यह होती है कि जब उन्हें अल्लाह और उसके रसूल की तरफ़ बुलाया जाए ताकि वे उनके दरमियान फ़ैसला फ़रमाएं, तो वे कहते हैं, 'हमने सुना और हमने इताअत की;' और यही वे लोग हैं जो मुकम्मल कामयाब होने वाले हैं [136]। (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अन-नूर आयत 51 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

तफ़सीर सूरह अन-नूर – आयत 51

"सच्चे मोमिनों की बात तो बस यह है कि जब अल्लाह और रसूल की तरफ़ बुलाया जाए ताकि फ़ैसला फ़रमाएं, तो वे कहते हैं: 'हमने सुना और इताअत की;' और यही लोग कामयाब हैं [136]।"

[136] कामिल ईमान का तकाज़ा: समअ व ताअत

सच्चे मोमिन की पहचान यह है कि रसूलुल्लाह ﷺ का फ़रमान सुनते ही सर-ए-तस्लीम ख़म कर देता है, चाहे फ़ैसला उसके ज़ाती नफ़ा में हो या नुक़सान में। जो लोग अपनी मर्ज़ी को रसूल की मर्ज़ी के ताबे कर देते हैं, वही दोनों जहाँ में हक़ीक़ी कामियाबी पाने वाले हैं।

Sign up for Newsletter

×

Download Our Quran App

For a faster and smoother experience,
install our mobile app now.

Download Now