कुरान - 13:11 सूरह अर-राँद अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

11
لَهُۥ مُعَقِّبَٰتٞ مِّنۢ بَيۡنِ يَدَيۡهِ وَمِنۡ خَلۡفِهِۦ يَحۡفَظُونَهُۥ مِنۡ أَمۡرِ ٱللَّهِۗ إِنَّ ٱللَّهَ لَا يُغَيِّرُ مَا بِقَوۡمٍ حَتَّىٰ يُغَيِّرُواْ مَا بِأَنفُسِهِمۡۗ وَإِذَآ أَرَادَ ٱللَّهُ بِقَوۡمٖ سُوٓءٗا فَلَا مَرَدَّ لَهُۥۚ وَمَا لَهُم مِّن دُونِهِۦ مِن وَالٍ

Transliteration: (Lahoo mu'aqqibaatum mim baini yadaihi wa min khalfihee yahfazoonahoo min amril laah; innal laaha laa yughaiyiru maa biqawmin hattaa yughaiyiroo maa bianfusihim; wa izaaa araadal laahu biqawmin sooo'an falaa maradda lah; wa maa lahum min dooniheeminw waal)

प्रत्येक मनुष्य के आगे और पीछे एक के बाद एक आने वाले (फ़रिश्ते) लगे हुए हैं जो अल्लाह के आदेश से उसकी सुरक्षा करते हैं। वास्तव में, अल्लाह किसी क़ौम की दशा को उस समय तक नहीं बदलता जब तक कि वे स्वयं अपने भीतर की स्थिति को न बदल लें। और जब अल्लाह किसी क़ौम पर कोई विपत्ति (अज़ाब) लाने का इरादा कर ले, तो उसे टाला नहीं जा सकता, और उसके मुक़ाबले में उनका कोई सहायक व संरक्षक नहीं होता। (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अर-राँद आयत 11 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

📖 सूरह अर्-रअद – आयत 11 का हिन्दी अनुवाद और तफ़्सीर

✅ [1] मुहाफ़िज़ फ़रिश्ते (पहरेदार)

हर इंसान के साथ आगे-पीछे अल्लाह के फ़रिश्ते तैनात रहते हैं जो तक़दीर के फ़ैसलों के तहत उसकी हिफ़ाज़त करते हैं।

✅ [2] क़ौमों के उत्थान और पतन का ईश्वरीय क़ानून

यह आयत इतिहास और समाजशास्त्र का अटल नियम बयान करती है: 'इन्नल्लाहा ला युग़य्यिरु मा बिक़ौमिन ह़त्ता युग़य्यिरू मा बि-अनफ़ुसिहिम'। अल्लाह किसी क़ौम को मिली नेमत और इज़्ज़त को उस वक़्त तक ज़िल्लत में नहीं बदलता जब तक कि वह क़ौम ख़ुद अपनी नेकी, किरदार और सच्चाई को छोड़कर गुनाह और नाफ़रमानी का रास्ता न अपना ले।

Sign up for Newsletter

×

Download Our Quran App

For a faster and smoother experience,
install our mobile app now.

Download Now