कुरान - 30:29 सूरह अर-रूम अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

29
بَلِ ٱتَّبَعَ ٱلَّذِينَ ظَلَمُوٓاْ أَهۡوَآءَهُم بِغَيۡرِ عِلۡمٖۖ فَمَن يَهۡدِي مَنۡ أَضَلَّ ٱللَّهُۖ وَمَا لَهُم مِّن نَّـٰصِرِينَ

Transliteration: (Balit taba'al lazeena zalamooo ahwaaa'ahum bighairi 'ilmin famai yahdee man adallal laahu wa maa lahum min naasireen)

बल्कि ज़ालिमों ने बग़ैर किसी इल्म के अपनी ख़्वाहिशात की पैरवी की [59]; पस किसे यह ताक़त है कि उसे हिदायत दे जिसे अल्लाह ने गुमराह छोड़ दिया हो [60]? और उनका कोई मददगार न होगा [61]। (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अर-रूम आयत 29 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

सूरह अर-रूम तफ़सीर - आयत 29

"बल्कि ज़ालिमों ने बग़ैर किसी इल्म के अपनी ख़्वाहिशात की पैरवी की [59]; पस किसे यह ताक़त है कि उसे हिदायत दे जिसे अल्लाह ने गुमराह छोड़ दिया हो [60]? और उनका कोई मददगार न होगा [61]।"

[59] ख़्वाहिशात-ए-नफ़्सानी की पैरवी

मुशरिकीन के पास शिर्क की कोई दलील या इल्म नहीं था, बल्कि वे महज़ अपने नफ़्स की ख़्वाहिशात और बाप-दादा की रस्मों के गुलाम बने हुए थे।

[60] हठधर्मी की सज़ा गुमराही

जब कोई इंसान हक़ की तमाम रौशन निशानियाँ देखकर भी जान-बूझकर इंकार करता है, तो अल्लाह की सुन्नत के मुताबिक़ उसे गुमराही में छोड़ दिया जाता है। फिर कोई उसे हिदायत नहीं दे सकता।

[61] कोई मददगार नहीं

क़यामत के दिन ऐसे ज़ालिमों का कोई मददगार या हिमायती न होगा जो उन्हें अल्लाह के अज़ाब से बचा सके।

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