Transliteration: (Balit taba'al lazeena zalamooo ahwaaa'ahum bighairi 'ilmin famai yahdee man adallal laahu wa maa lahum min naasireen)
"बल्कि ज़ालिमों ने बग़ैर किसी इल्म के अपनी ख़्वाहिशात की पैरवी की [59]; पस किसे यह ताक़त है कि उसे हिदायत दे जिसे अल्लाह ने गुमराह छोड़ दिया हो [60]? और उनका कोई मददगार न होगा [61]।"
मुशरिकीन के पास शिर्क की कोई दलील या इल्म नहीं था, बल्कि वे महज़ अपने नफ़्स की ख़्वाहिशात और बाप-दादा की रस्मों के गुलाम बने हुए थे।
जब कोई इंसान हक़ की तमाम रौशन निशानियाँ देखकर भी जान-बूझकर इंकार करता है, तो अल्लाह की सुन्नत के मुताबिक़ उसे गुमराही में छोड़ दिया जाता है। फिर कोई उसे हिदायत नहीं दे सकता।
क़यामत के दिन ऐसे ज़ालिमों का कोई मददगार या हिमायती न होगा जो उन्हें अल्लाह के अज़ाब से बचा सके।
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