Transliteration: (Fa aqim wajhaka liddeeni Haneefaa; fitratal laahil latee fataran naasa 'alaihaa; laa taabdeela likhalqil laah; zaalikad deenul qaiyimu wa laakinna aksaran naasi laa ya'lamoon)
"पस आप यकसू होकर अपना रुख़ इस सच्चे दीन की तरफ़ सीधा रखिए [62], अल्लाह की फ़रमांबरदारी के लिए [63]; यह अल्लाह की बनाई हुई फ़ितरत है जिस पर उसने लोगों को पैदा किया है [64]; अल्लाह की पैदाइश में कोई तब्दीली नहीं [65]; यही बिल्कुल सीधा और सच्चा दीन है [66], लेकिन अक्सर लोग नहीं जानते।"
हुज़ूर अकरम ﷺ और अहले ईमान को हुक्म हुआ कि हर बातिल तरीक़े और शिर्क से बे-तअल्लुक़ होकर अपना रुख़ सिर्फ़ इस्लाम और तौहीद की तरफ़ सीधा रखें।
दीन में किसी तरह की मिलावट या ग़ैर-शरई रुसूमात की गुंजाइश नहीं। इबादत और अक़ीदा सिर्फ़ अल्लाह की रज़ा के लिए ख़ालिस होना चाहिए।
हदीस शरीफ़ में फ़रमाया गया: "हर बच्चा फ़ितरत (इस्लाम व तौहीद की सलाहीयत) पर पैदा होता है, फिर उसके माँ-बाप उसे यहूदी, ईसाई या मजूसी बना देते हैं।" यानी तौहीद इंसान के ख़मीर में दाख़िल है।
अल्लाह ने जिस फ़ितरत पर इंसान को बनाया है वह असल में पाक है। बाद के असरार और माहौल उसे गुमराह करते हैं।
यही इस्लाम बिल्कुल सीधा, मोअतदिल और सच्चा दीन है जो इंसान को दुनिया और आख़िरत दोनों में नजात दिलाता है, मगर अक्सर लोग अपनी जहालत की वजह से इससे महरूम रहते हैं।
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