Transliteration: (Minal lazeena farraqoo deenahum wa kaanoo shiya'an kullu hizbim bimaa ladaihim farihoon)
"उन लोगों में से जिन्होंने अपने दीन को टुकड़े-टुकड़े कर दिया [70] और कई फ़िरक़ों में बंट गए; हर फ़िरक़ा उसी चीज़ पर ख़ुश है [71] जो उसके पास है।"
यहाँ "उनके दीन" से मुराद उनके शिर्किया अक़ाइद हैं, और "टुकड़े-टुकड़े करने" का मतलब है कि वे किसी एक अक़ीदे पर मुत्तहिद नहीं हैं।
कुछ दो ख़ुदाओं को मानते हैं, कुछ तीन को, और कुछ उससे भी ज़्यादा को।
इसी तरह हर फ़िरक़े ने अपनी मनगढ़ंत शरीअत बना ली है, और कोई भी एक निज़ाम पर मुत्तफ़िक़ नहीं है।
इसका मफ़हूम यह है कि अगरचे ये तमाम फ़िरक़े बातिल पर हैं, लेकिन हर फ़िरक़ा अपनी गुमराही पर इतराता है, उसे हक़ समझता है, और ऐसा करके वे असली हक़ का इंकार कर देते हैं।
यह आयत इस्लामी फ़ुक़हा के दर्मियान फ़िक़्ही इख़्तिलाफ़ात (जैसे हनफ़ी, शाफ़ई, मालिकी, या हनबली होना) पर सादिक़ नहीं आती, क्योंकि वे तहक़ीक़ पर मब्नी हैं, नफ़्सानी ख़्वाहिशात पर नहीं, और वे फ़ुरूई मसाइल से मुताअल्लिक़ हैं, बुनियादी अक़ाइद से नहीं।
इसी तरह यह सहाबा-ए-किराम के इख़्तिलाफ़ पर भी लागू नहीं होती, क्योंकि तमाम अंबिया का बुनियादी दीन एक ही था, अगरचे फ़ुरूई अहकाम अलग थे।
ताहम, इस आयत में वे फ़िरक़े ज़रूर दाख़िल हैं जो हद-ए-कुफ़्र तक पहुँच गए, जैसे क़ादियानी और चकरालवी, जिन्होंने बिदअत और गुमराही के ज़रिए दीन की धज्जियाँ उड़ा दीं।
रसूलुल्लाह ﷺ ने पेशीनगोई फ़रमाई थी: "मेरी उम्मत तिहत्तर फ़िरक़ों में बंट जाएगी। एक के सिवा सब दोज़ख़ में जाएंगे।"
सिर्फ़ वही जमाअत नजात पाएगी जो हक़ पर होगी—जो सहाबा और अहले सुन्नत की असली तालीमात पर क़ायम रहेगी।
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