Transliteration: (Wa izaa massan naasa durrun da'aw Rabbahum muneebeena ilaihi summa izaaa azaqahum minhu rahmatan izaa fareequm minhum be Rabbihim yushrikoon)
"और जब लोगों को कोई तकलीफ़ [72] पहुंचती है, तो वे अपने रब को उसकी तरफ़ रुजूअ करते हुए [73] पुकारते हैं; फिर जब वह उन्हें अपनी तरफ़ से रहमत का मज़ा चखाता है [74], तो अचानक उनमें से एक गिरोह अपने रब के साथ शिर्क करने लगता है [75];"
यहाँ “लोगों” से मुराद काफ़िर और मुशरिक हैं, और “तकलीफ़” से मुराद आफ़ात व मसाइब हैं जैसे बीमारी, क़हत और सख़्ती।
यह बात बाद की आयात से साफ़ ज़ाहिर है, जो ऐसे वक़्त में उनके रद्देअमल को बयान करती हैं।
सख़्ती और मुसीबत में मक्का के मुशरिक भी हुज़ूर नबी-ए-करीम ﷺ से दुआ की दरख़्वास्त करते थे।
फ़िरऔन भी अज़ाब के वक़्त हज़रत मूसा (अलैहिस्सलाम) से अज़ाब टलने की दुआ की दरख़्वास्त करता था।
आज भी बहुत से सख़्त-दिल मुशरिक शदीद बीमारी या मुसीबत के वक़्त नेक मुसलमानों से दुआ करवाते हैं—यह उनकी आरज़ी तौर पर अल्लाह की तरफ़ रुजूअ करने की अलामत है।
इससे हमें मालूम होता है कि दुनिया में काफ़िरों को भी अल्लाह की रहमत से हिस्सा मिलता है—कभी उनकी अपनी दुआ की क़बूलियत के ज़रिए, या उनके हक़ में मुसलमानों की मक़बूल दुआओं के ज़रिए।
मुसीबत से नजात पाने या आसानी मिलने के बाद उनमें से कुछ लोग दोबारा शिर्क करने लगते हैं—अल्लाह के साथ शरीक ठहराने लगते हैं।
कुछ लोग साबित-क़दम रहकर ईमान ले आते हैं, लेकिन अक्सर लोग अपने पुराने तरीक़े पर लौट जाते हैं, जैसा कि फ़रमाया गया:
“फिर जब वह उन्हें बचाकर ख़ुश्की तक पहुँचा देता है तो उनमें से बाज़ दरमियानी राह पर रहते हैं...” (सूरह लुक़मान, 31:32)।
इसीलिए आयत में फ़रमाया “उनमें से एक गिरोह”—सब नहीं, बल्कि अक्सर लोग दोबारा कुफ़्र में मुब्तला हो जाते हैं।
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