Transliteration: (Am anzalnaa 'alaihim sultaanan fahuwa yatakallamu bimaa kaanoo bihee yushrikoon)
"क्या हमने उन पर कोई ऐसी सनद (दलील) उतारी है जो उस चीज़ के हक़ में बोलती हो जिसे वे अल्लाह का शरीक ठहराते हैं [77]?"
अल्लाह तआला मुशरिकीन से सवाल फ़रमाता है:
क्या उन पर कोई ऐसी आसमानी किताब या दलील नाज़िल हुई है जो उन्हें अल्लाह के साथ शिर्क करने की इजाज़त देती हो?
यह इस्तिफ़हाम-ए-इन्कारी उनके अक़ाइद के खोखलेपन को बे-नक़ाब करता है—क्योंकि किसी भी आसमानी किताब या वही ने कभी शिर्क की ताईद नहीं की।
इस आयत से मालूम होता है कि काफ़िरों और झूठे मुद्दइयों से दलील माँगना जायज़ है, इसलिए नहीं कि वे सच्चे हो सकते हैं, बल्कि इसलिए ताकि उनके बातिल दावों की रुसवाई और हक़ीक़त ज़ाहिर हो सके।
ताहम, इस्लाम की सच्चाई में शक करते हुए दलील माँगना या यह सोचना कि सामने वाला सच्चा हो सकता है, ख़ुद कुफ़्र है।
पस, बातिल अक़ाइद वालों से मुनाज़रा करने का शरई जवाज़ इसी आयत से साबित है, बशर्ते कि मक़सद बातिल का रद् करना हो, न कि दिल में शक पैदा करना।
For a faster and smoother experience,
install our mobile app now.
संबंधित आयात (विषय) / Related Ayat