Transliteration: (Wa izaaa azaqnan naasa rahmatan farihoo bihaa wa in tusibhum sayyi'atum bimaa qaddamat aydeehim izaa hum yaqnatoon)
"और जब हम लोगों को अपनी रहमत का मज़ा चखाते हैं, तो वे उस पर इतराने लगते हैं [78]; और अगर उनके हाथों के भेजे हुए करतूतों की वजह से उन पर कोई मुसीबत आ पड़े, तो अचानक वे मायूस होने लगते हैं [79]।"
यह आयत उन लोगों के बारे में है जो अल्लाह की रहमत पाकर तकब्बुर भरी ख़ुशी मनाते हैं—जैसे सेहत, दौलत या कामयाबी मिलने पर।
तकब्बुर और ख़ुद-पसंदी से ख़ुश होना मज़मूम (बुरा) है, जबकि शुक्रगुज़ारी के तौर पर ख़ुशी मनाना इस्लाम में पसंदीदा है।
अल्लाह तआला ने फ़रमाया:
“तुम फ़रमाओ: अल्लाह ही के फ़ज़्ल और उसी की रहमत पर, पस उसी पर चाहिए कि वे ख़ुशी करें...” (सूरह यूनुस, 10:58)
और फ़रमाया: “और अपने रब की नेअमत का ख़ूब चर्चा करो।” (सूरह अज़-ज़ुहा, 93:11)
पस, शुक्र पर मब्नी ख़ुशी इबादत है, जबकि तकब्बुर पर मब्नी इतराना रूहानी तौर पर हलाकत-ख़ेज़ है।
जब उन पर कोई मुसीबत आती है—जो उनके अपने गुनाहों का नतीजा होती है—तो ऐसे लोग मायूसी और ना-उम्मीदी में गिर जाते हैं।
यह रवैया सख़्त नापसंदीदा है, क्योंकि एक मोमिन को कभी भी अल्लाह की रहमत से मायूस नहीं होना चाहिए।
अल्लाह फ़रमाता है:
“अल्लाह की रहमत से ना-उम्मीद न हो।” (सूरह अज़-ज़ुमर, 39:53)
पस, यह आयत यह सबक़ देती है कि:
रहमत महज़ इलाही फ़ज़्ल से मिलती है।
मुसीबतें हमारे अपने बुरे आमाल की वजह से आती हैं।
मोमिन को चाहिए कि आसानी में शुक्र करे और तंगी में सब्र करे।
ना-उम्मीद होना काफ़िरों का तरीक़ा है, उनका नहीं जो अल्लाह पर भरोसा रखते हैं।
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